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Manohar Shimpi
khwahishon se vo kahaan in ke hue
khwahishon se vo kahaan in ke hue | ख़्वाहिशों से वो कहाँ इन के हुए
- Manohar Shimpi
ख़्वाहिशों
से
वो
कहाँ
इन
के
हुए
छोड़
के
फिर
साथ
कमसिन
के
हुए
रात
भी
मुश्किल
से
कटती
हिज्र
में
चाँद
तारे
अर्श
के
गिन
के
हुए
बेच
के
कूड़ा
चलाते
घर
कोई
एक
सौ
रुपए
कभी
दिन
के
हुए
हुस्न
ला-फ़ानी
नहीं
है
हम-सफ़र
देख
के
इक
ही
दफ़ा
सिन
के
हुए
उस
बलंदी
पर
कभी
हम
भी
रहे
टूट
के
फिर
रात
क्या
दिन
के
हुए
दौर
था
कैसा
'मनोहर'
ख़ूब
वो
फ़ासलों
से
हम-नफ़स
जिन
के
हुए
- Manohar Shimpi
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दूर
रह
के
क़रीब
है
यारों
सच
कहूँ
वो
हबीब
है
यारों
राह
में
है
जवाँ
फ़िज़ा
फिर
भी
वो
नज़ारे
अजीब
है
यारों
ज़िंदगी
एक
खेल
ही
तो
है
और
साँसें
हबीब
है
यारों
आप
जैसे
रफ़ीक़
हैं
थोड़े
ये
हमारा
नसीब
है
यारों
सिलसिले
ही
न
हैं
अभी
फिर
भी
इश्क़
में
क्यूँ
रक़ीब
है
यारों
इस
कदर
फिर
धधक
रही
है
क्यूँ
आग
जैसे
क़रीब
है
यारों
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कर्ब
से
ही
कोई
रिश्ता
है
पुराना
ख़्वाब
दे
जाते
नया
फिर
इक
बहाना
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उस्लूब
से
तहज़ीब-ए-कुहन
बोल
रहा
है
हर
शख़्स
से
करने
को
जतन
बोल
रहा
है
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महज़
जिद्द-ओ-जहद
भी
इक
काम
ही
है
कश्मकश
से
फिर
मिले
अंजाम
ही
है
मय-कदे
में
क्या
सभी
का
काम
ही
है
कोई
उन
में
से
कहाँ
बदनाम
ही
है
कोई
जब
भी
हो
बुलंदी
पर
तभी
फिर
जो
बढ़े
है
वो
उसी
का
नाम
ही
है
डर
किसी
को
जब
सताता
इश्क़
में
ही
इश्क़
के
वो
नाम
से
गुमनाम
ही
है
एक
जैसे
सब
लगे
पीते
हुए
ही
कोई
प्याले
से
न
छलका
जाम
ही
है
ज़िंदगी
में
धूप
भी
है
छाँव
भी
है
जब
कभी
सूरज
ढले
तो
शाम
ही
है
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निगाह-ए-करम
से
नज़र
मिल
गई
है
उसी
की
झलक
से
कली
खिल
गई
है
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