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Manohar Shimpi
ik mulaqaat ho kabhi tujh se
ik mulaqaat ho kabhi tujh se | इक मुलाक़ात हो कभी तुझ से
- Manohar Shimpi
इक
मुलाक़ात
हो
कभी
तुझ
से
दिल
की
फिर
बात
हो
कभी
तुझ
से
- Manohar Shimpi
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अदाओं
से
तेरे
मुझ
को
ख़िराम-ए-नाज़
बहलाए
हसीं
चेहरे
पे
नूरानी
चमक
फिर
चाँद
कहलाए
Manohar Shimpi
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बेटियांँ
ही
क़रीब
होती
हैं
वो
न
सबके
नसीब
होती
हैं
Manohar Shimpi
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शराब-ए-हक़ीक़त
किसे
ही
बताता
वो
जाम-ए-इनायत
कहाँ
फिर
छुपाता
Manohar Shimpi
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ये
गोया
आदमी
भी
आदमी
होता
लिहाज़-ए-इश्क़
भी
तो
लाज़मी
होता
ज़मीं
या
आसमाँ
तेरे
कभी
होते
कभी
मैं
तेरे
आँखों
की
नमी
होता
दिलों-दिल
रंज
भी
तो
काग़ज़ी
रहता
उसे
फिर
दूर
करना
बाहमी
होता
हवाएँ
तेज़
आए
और
टकराए
बयारों
का
सफ़र
तो
मौसमी
होता
अदावत
रंजिशें
कब
ख़त्म
ये
होगी
अदू
भी
तो
'मनोहर'
आदमी
होता
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Manohar Shimpi
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क़ल्ब
भी
ग़म
से
भर
गया
कब
का
टूट
के
फिर
बिखर
गया
कब
का
हादिसे
के
लिए
करें
क्या
ही
रोष
था
जो
उतर
गया
कब
का
यूँँ
बिछड़कर
कहाँ
मिले
साहिल
ख़ास
लम्हा
गुज़र
गया
कब
का
अब
चलो
बात
और
करते
हैं
देखो
तूफाँ
ठहर
गया
कब
का
दोस्त
कहते
उसे
हुआ
क्या
है
था
वो
बिगड़ा
सुधर
गया
कब
का
ज़िक्र
जिसका
सभी
करे
हैं
वो
क़ैदस
कैसे
घर
गया
कब
का
गुम-शुदा
शख़्स
जो
'मनोहर'
था
शोर-ग़ुल
में
वो
मर
गया
कब
का
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Manohar Shimpi
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