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Manohar Shimpi
raat ko hi charaagh jalte hain
raat ko hi charaagh jalte hain | रात को ही चराग़ जलते हैं
- Manohar Shimpi
रात
को
ही
चराग़
जलते
हैं
चाँद
तारें
तभी
निकलते
हैं
दश्त
में
जब
दरख़्त
जलते
तब
लोग
फिर
आँख
ख़ूब
मलते
हैं
हौसलों
से
भरे
परिंदे
हैं
साथ
उड़ते
हुए
निकलते
हैं
दोस्त
भी
इत्तिफ़ाक़
से
मिलते
दूर
तक
साथ
साथ
चलते
हैं
रात
भर
जो
कई
दफ़ा
जगते
बारहा
आँख
फिर
मसलते
हैं
बंदगी
शाम
रंग
से
हो
तो
हम
उसी
रंग
में
ही
ढलते
हैं
अस्ल
में
फ़ेहरिस्त
का
क्या
है
नाम
जब
रोज़
सब
बदलते
हैं
- Manohar Shimpi
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साया
है
कम
खजूर
के
ऊँचे
दरख़्त
का
उम्मीद
बाँधिए
न
बड़े
आदमी
के
साथ
Kaif Bhopali
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जिसे
तुम
काट
आए
उस
शजर
को
ढूँढता
होगा
परिंदा
लौटकर
के
अपने
घर
को
ढूँढता
होगा
Bhaskar Shukla
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परिंद
क्यूँँ
मिरी
शाख़ों
से
ख़ौफ़
खाते
हैं
कि
इक
दरख़्त
हूँ
और
साया-दार
मैं
भी
हूँ
Asad Badayuni
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रुकें
तो
धूप
से
नज़रें
बचाते
रहते
हैं
चलें
तो
कितने
दरख़्त
आते
जाते
रहते
हैं
Charagh Sharma
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उड़
गए
सारे
परिंदे
मौसमों
की
चाह
में
इंतिज़ार
उन
का
मगर
बूढे
शजर
करते
रहे
Ambreen Haseeb Ambar
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इक
मुहब्बत
से
भरी
उस
ज़िंदगी
के
ख़्वाब
हैं
पेड़
दरिया
और
पंछी
तेरे
मेरे
ख़्वाब
हैं
Neeraj Nainkwal
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वो
पास
क्या
ज़रा
सा
मुस्कुरा
के
बैठ
गया
मैं
इस
मज़ाक़
को
दिल
से
लगा
के
बैठ
गया
दरख़्त
काट
के
जब
थक
गया
लकड़हारा
तो
इक
दरख़्त
के
साए
में
जा
के
बैठ
गया
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Zubair Ali Tabish
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है
दुख
तो
कह
दो
किसी
पेड़
से
परिंदे
से
अब
आदमी
का
भरोसा
नहीं
है
प्यारे
कोई
Madan Mohan Danish
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सब
परिंदों
से
प्यार
लूँगा
मैं
पेड़
का
रूप
धार
लूँगा
मैं
तू
निशाने
पे
आ
भी
जाए
अगर
कौन
सा
तीर
मार
लूँगा
मैं
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Tehzeeb Hafi
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पेड़
का
दुख
तो
कोई
पूछने
वाला
ही
न
था
अपनी
ही
आग
में
जलता
हुआ
साया
देखा
Jameel Malik
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ये
अजीब
ही
हैं
अदावतें
जो
इसी
सदी
का
शजर
नहीं
वो
ही
दाव
अब्र
सा
जब
चले
है
तो
बादलों
का
भी
डर
नहीं
Manohar Shimpi
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ज़िंदगी
में
धूप
भी
है
छाँव
भी
है
महज़
सूरज
जो
ढले
तो
शाम
ही
है
Manohar Shimpi
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कैसे
रंगत
तेरे
चेहरे
की
पड़ी
है
हिज्र
में
वहशत
की
जैसे
ये
घड़ी
है
Manohar Shimpi
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मारिफ़त
से
नवाज़
दे
मुझको
काम
तेरा
जवाज़
दे
मुझको
Manohar Shimpi
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एक
रास्ते
से
भी
रास्ते
निकलते
हैं
राह
में
क़रीबी
से
वास्ते
निकलते
हैं
Manohar Shimpi
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