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Manohar Shimpi
muntazir baat dil kii bataaye koii
muntazir baat dil kii bataaye koii | मुंतज़िर बात दिल की बताए कोई
- Manohar Shimpi
मुंतज़िर
बात
दिल
की
बताए
कोई
ख़्वाहिशें
दिल
में
फिर
से
जगाए
कोई
मानते
बात
ही
कब
बड़ों
की
सभी
ना-समझ
है
उन्हें
ही
मनाए
कोई
आस
दिल
में
जगी
दास्ताँ
से
तेरे
रंज
कैसे
तुझे
फिर
बताए
कोई
आस्ताँ
है
नहीं
या-ख़ुदा
अब
कोई
फिर
तेरा
ही
जुनूँ
ही
जगाए
कोई
आँख
से
अश्क़
ही
फिर
निकलते
रहे
हादिसा
क्या
हुआ
है
बताए
कोई
रात
आख़िर
उसी
नाम
से
हो
गई
हिज्र
की
नींद
से
भी
जगाए
कोई
राम
श्री
राम
ही
है
ज़ुबाँ
पर
सभी
नाम
से
भी
कोई
ग़म
भुलाए
कोई
- Manohar Shimpi
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बदल
जाएँगे
ये
दिन
रात
'अजमल'
कोई
ना-मेहरबाँ
कब
तक
रहेगा
Ajmal Siraj
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रात
के
जिस्म
में
जब
पहला
पियाला
उतरा
दूर
दरिया
में
मेरे
चाँद
का
हाला
उतरा
Kumar Vishwas
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आज
की
रात
दिवाली
है
दिए
रौशन
हैं
आज
की
रात
ये
लगता
है
मैं
सो
सकता
हूँ
Azm Shakri
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मैं
जिस
के
साथ
कई
दिन
गुज़ार
आया
हूँ
वो
मेरे
साथ
बसर
रात
क्यूँँ
नहीं
करता
Tehzeeb Hafi
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तन्हाई
के
हुजूम
में
वो
एक
तेरी
याद
जैसे
अँधेरी
रात
में
जलता
हुआ
दिया
Sagheer Lucky
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रात
सोने
के
लिए
दिन
काम
करने
के
लिए
वक़्त
मिलता
ही
नहीं
आराम
करने
के
लिए
Jamal Ehsani
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यहाँ
पे
कल
की
रात
सर्द
थी
हर
एक
रोज़
से
सो
रात
भर
बुझा
नहीं
तुम्हारी
याद
का
अलाव
Siddharth Saaz
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ये
कहाँ
की
रीत
है
जागे
कोई
सोए
कोई
रात
सब
की
है
तो
सब
को
नींद
आनी
चाहिए
Madan Mohan Danish
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उस
के
ख़त
रात
भर
यूँँ
पढ़ता
हूँ
जैसे
कल
इम्तिहान
हो
मेरा
Zubair Ali Tabish
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रात
भर
उन
का
तसव्वुर
दिल
को
तड़पाता
रहा
एक
नक़्शा
सामने
आता
रहा
जाता
रहा
Akhtar Shirani
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हिज्र
है
वस्ल
है
जवानी
है
इश्क़
की
ख़ास
इक
कहानी
है
Manohar Shimpi
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कैसी
कोशिश
कैसा
अंदाज़ा
तेरा
हर
तरफ़
बातें
तेरी
चर्चा
तेरा
पुर्सिश-ए-ग़म
की
किसी
से
बात
हो
दर
पे
होगा
मुंतज़िर
ठहरा
तेरा
कोई
हस्ती
को
बताए
झूठ
तो
सच
कहाँ
होगा
सही
सारा
तेरा
दोस्ती
में
जब
दिखावा
कोई
हो
आसमाँ
सा
नेक
हो
यारा
तेरा
दश्त-आवारा
लगे
है
जब
कभी
हिज्र
में
शायद
लगा
सदमा
तेरा
ज़िक्र
होता
है
अगर
यूँँ
शब
का
तो
मैं
दिया
हूँ
रात
में
जलता
तेरा
कोई
रुस्वा
ही
'मनोहर'
क्यूँँ
करें
रोष
शायद
ही
नहीं
देखा
तेरा
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Manohar Shimpi
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दिलों
में
मुरव्वत
न
होती
हमें
फिर
मुहब्बत
न
होती
हवाओं
में
निकहत
न
होती
फ़ज़ाओं
में
जन्नत
न
होती
बुराई
अगर
हो
दिलों
में
तभी
फिर
इबादत
न
होती
किए
ही
बिना
सब
मिले
तो
तभी
कोई
मन्नत
न
होती
शब-ए-वस्ल
भी
ख़ूब
होती
जुदाई
में
क़ुर्बत
न
होती
खुले
आम
'आशिक़
मिले
तो
उसी
घर
बग़ावत
न
होती
कमी
जब
दु'आओं
में
होगी
वहाँ
पर
शफ़ा'अत
न
होती
कभी
एक
छत
में
"मनोहर"
जहाँ
में
अदावत
न
होती
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Manohar Shimpi
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अगर
तुम्हें
मुझ
पे
भी
दिलों-दिल
क़रार
या
एतिबार
होता
न
इंतिहा
इश्क़
की
ये
होती
न
साअत-ए-इज़्तिरार
होता
Manohar Shimpi
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पल
सुनहरे
तो
ज़माना
ढूँढ़ता
है
सिर्फ़
'आशिक़
इक
बहाना
ढूँढ़ता
है
Manohar Shimpi
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