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Manohar Shimpi
is qadar pal yahaañ beetata baarha
is qadar pal yahaañ beetata baarha | इस क़दर पल यहाँ बीतता बारहा
- Manohar Shimpi
इस
क़दर
पल
यहाँ
बीतता
बारहा
झूठ
कैसे
कहीं
जीतता
जा
रहा
हर
घड़ी
का
कहाँ
ध्यान
मैंने
रखा
हाथ
से
वक़्त
फिर
बीतता
जा
रहा
तीर
वो
तंज
का
दिल
पे
ऐसे
लगा
फिर
उसी
ज़र्ब
से
जीतता
आ
रहा
ज़िंदगी
खेल
है
कब
उसे
खेलता
खेलने
का
समाँ
बीतता
जा
रहा
इल्म
हर
बात
का
है
ज़रूरी
यहाँ
हौसलों
से
नहीं
जीतता
बारहा
- Manohar Shimpi
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हमें
पढ़ाओ
न
रिश्तों
की
कोई
और
किताब
पढ़ी
है
बाप
के
चेहरे
की
झुर्रियाँ
हम
ने
Meraj Faizabadi
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हमारा
इल्म
बूढ़ा
हो
रहा
है
किताबें
धूल
खाती
जा
रही
हैं
Kaif Uddin Khan
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बेटियाँ
बाप
की
आँखों
में
छुपे
ख़्वाब
को
पहचानती
हैं
और
कोई
दूसरा
इस
ख़्वाब
को
पढ़
ले
तो
बुरा
मानती
हैं
Iftikhar Arif
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बहुत
से
ग़म
समेट
कर
बनाई
एक
डायरी
चुवाव
देख
रात
भर
बनाई
एक
डायरी
ये
हर्फ़
हर्फ़
लफ़्ज़
लफ़्ज़
क़ब्र
है
वरक़
वरक़
दिल-ए-हज़ीं
से
इस
क़दर
बनाई
एक
डायरी
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Aves Sayyad
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हम
ऐसी
कुल
किताबें
क़ाबिल-ए-ज़ब्ती
समझते
हैं
कि
जिन
को
पढ़
के
लड़के
बाप
को
ख़ब्ती
समझते
हैं
Akbar Allahabadi
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किताबें,
रिसाले
न
अख़बार
पढ़ना
मगर
दिल
को
हर
रात
इक
बार
पढ़ना
Bashir Badr
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अगर
फ़ुर्सत
मिले
पानी
की
तहरीरों
को
पढ़
लेना
हर
इक
दरिया
हज़ारों
साल
का
अफ़्साना
लिखता
है
Bashir Badr
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बिछड़
गया
हूँ
मगर
याद
करता
रहता
हूँ
किताब
छोड़
चुका
हूँ
पढ़ाई
जारी
है
Ali Zaryoun
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ज़ख़्म
की
इज़्ज़त
करते
हैं
देर
से
पट्टी
खोलेंगे
चेहरा
पढ़ने
वाले
चोर
गठरी
थोड़ी
खोलेंगे
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Khurram Afaq
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तुझे
कैसे
इल्म
न
हो
सका
बड़ी
दूर
तक
ये
ख़बर
गई
तिरे
शहर
ही
की
ये
शाएरा
तिरे
इंतिज़ार
में
मर
गई
Mumtaz Naseem
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सितारों
के
सिवा
भी
ये
निराली
ही
मुझे
लगती
चराग़ों
से
सजी
महफ़िल
दिवाली
ही
मुझे
लगती
Manohar Shimpi
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गाँव
वीरान
हुआ
कोई
न
रोने
वाला
अब
बचा
कौन
तमाशा
नहीं
होने
वाला
Manohar Shimpi
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अदू
से
बात
क्या
करना
अमन
की
चलो
अब
बहस
करते
हैं
चमन
की
Manohar Shimpi
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दोस्त
भी
ख़ूब
हैं
मनाने
को
बैठ
के
साथ
मुस्कुराने
को
हम
सेफ़र
दूर
जब
रहे
तन्हा
हिज्र
होता
है
आज़माने
को
रास्ते
जब
हुए
जुदा
घर
के
कोई
दीवार
ही
हो
ढाने
को
जब
दिल-ओ-दिल
रहे
ख़फ़ा
ही
तब
क्यूँ
जगह
ही
रहे
बहाने
को
महज़
फ़नकार
जब
हुए
रुख़्सत
ख़ामुशी
तब
दिखी
ज़माने
को
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Manohar Shimpi
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जैसे
माँ-बाप
का
हक़
अदा
ही
हुआ
तब-से
माँ
की
दु'आ
से
भला
ही
हुआ
रंग
चेहरे
पे
था
वो
अलग
ही
तो
था
अस्ल
में
शक्ल
से
सच
पता
ही
हुआ
फ़ालतू
बात
अब
कौन
सुनता
कोई
शे'र
सुनके
लगा
क्या
समा
ही
हुआ
ये
शब-ए-हिज्र
भी
कुछ
बयाँ
है
करे
जैसे
तारों
बिना
चंद्रमा
ही
हुआ
चंद
दिन
इस
जहाँ
में
बचे
जब
लगे
वक़्त
समझो
तभी
लापता
ही
हुआ
देखते
ही
उसे
ख़ास
है
जब
लगे
दिल-क़शी
का
असर
फिर
दवा
ही
हुआ
तुर्फ़गी
से
मिला
सब
उसी
का
ही
है
शुक्र
है
वो
मेरा
हम-नवा
ही
हुआ
कैसे
हालात
थे
तब
मनोहर
सुनो
रहनुमा
इक
मिला
वो
ख़ुदा
ही
हुआ
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Manohar Shimpi
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