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Manohar Shimpi
baarha dhoondhta raha us ko
baarha dhoondhta raha us ko | बारहा ढूँढ़ता रहा उस को
- Manohar Shimpi
बारहा
ढूँढ़ता
रहा
उस
को
जब
मिली
दिल-नशीं
कहा
उस
को
आग
नफ़रत
की
फैलती
क्यूँँ
है
कौन
दे
तूल
बारहा
उस
को
राह
में
रहगुज़र
मिला
मुझ
को
यह
सफ़र
याद
ही
रहा
उस
को
इंतिहा
हो
गई
मेरी
आख़िर
किस
क़दर
ख़ूब
फिर
सहा
उस
को
वक़्त
के
साथ
जो
न
बदला
वो
वास्ता
काश
ही
रहा
उस
को
- Manohar Shimpi
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हम
अपनी
जान
के
दुश्मन
को
अपनी
जान
कहते
हैं
मोहब्बत
की
इसी
मिट्टी
को
हिंदुस्तान
कहते
हैं
Rahat Indori
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कुछ
बात
है
कि
हस्ती
मिटती
नहीं
हमारी
सदियों
रहा
है
दुश्मन
दौर-ए-ज़माँ
हमारा
Allama Iqbal
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मुनाफ़िक़
दोस्तों
से
लाख
बेहतर
हैं
ख़ुदा
दुश्मन
कि
ग़द्दारी
नवाबों
से
हुकूमत
छीन
लेती
है
Unknown
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चार
दिन
झूठी
बाहों
के
आराम
से
मेरी
बिखरी
हुई
ज़िंदगी
ठीक
है
दोस्ती
चाहे
जितनी
बुरी
हो
मगर
प्यार
के
नाम
पर
दुश्मनी
ठीक
है
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SHIV SAFAR
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कच्चा
सा
घर
और
उस
पर
जोरों
की
बरसात
है
ये
तो
कोई
खानदानी
दुश्मनी
की
बात
है
Saahir
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अब
दोस्त
कोई
लाओ
मुक़ाबिल
में
हमारे
दुश्मन
तो
कोई
क़द
के
बराबर
नहीं
निकला
Munawwar Rana
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ये
सच
है
नफ़रतों
की
आग
ने
सब
कुछ
जला
डाला
मगर
उम्मीद
की
ठण्डी
हवाएँ
रोज़
आती
हैं
Munawwar Rana
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इज़हार-ए-इश्क़
उस
से
न
करना
था
'शेफ़्ता'
ये
क्या
किया
कि
दोस्त
को
दुश्मन
बना
दिया
Mustafa Khan Shefta
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अब
के
बार
मिल
के
यूँँ
साल-ए-नौ
मनाएँगे
रंजिशें
भुला
कर
हम
नफ़रतें
मिटाएँगे
Unknown
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इश्क़
तू
ने
बड़ा
नुक़सान
किया
है
मेरा
मैं
तो
उस
शख़्स
से
नफ़रत
भी
नहीं
कर
सकता
Liaqat Jafri
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जिया
मिरा
ही
पुकारे
किसे
बताऊँ
मैं
वफ़ा
निभा
न
सकी
कैसे
भूल
जाऊँ
मैं
Manohar Shimpi
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शरीक-ए-ज़िंदगी
अच्छी
रहे
अरमान
ही
होता
ग़म-ए-जानाँ
सिवा
जीना
कहाँ
आसान
ही
होता
Manohar Shimpi
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हर
घर
दियों
से
ही
हमीं
महफ़िल
सजाते
हैं
चलो
जश्न-ए-चराग़ाँ
भी
सभी
मिलके
मनाते
हैं
चलो
Manohar Shimpi
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माँ
से
कहाँ
प्यारी
कोई
मूरत
लगे
जैसे
ख़ुदा
के
शक्ल
सी
सूरत
लगे
Manohar Shimpi
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कई
सवाल
और
फिर
जवाब
भी
कोई
नहीं
तिरे
जमाल
सा
कहीं
शबाब
भी
कोई
नहीं
Manohar Shimpi
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