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Manish watan
batakar gaya hai khule zakham rakhna
batakar gaya hai khule zakham rakhna | बताकर गया है खुले ज़ख़्म रखना
- Manish watan
बताकर
गया
है
खुले
ज़ख़्म
रखना
कभी
ज़ख़्म
अपने
सिलेंगे
नहीं
हम
मुनासिब
नहीं
अब
हमारा
लगे
दिल
किसी
शख़्स
पर
अब
मरेंगे
नहीं
हम
- Manish watan
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नहीं
ये
फ़िक्र
कोई
रहबर-ए-कामिल
नहीं
मिलता
कोई
दुनिया
में
मानूस-ए-मिज़ाज-ए-दिल
नहीं
मिलता
Asrar Ul Haq Majaz
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कैसा
दिल
और
इस
के
क्या
ग़म
जी
यूँँ
ही
बातें
बनाते
हैं
हम
जी
Jaun Elia
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शाम-ए-फ़िराक़
अब
न
पूछ
आई
और
आ
के
टल
गई
दिल
था
कि
फिर
बहल
गया
जाँ
थी
कि
फिर
सँभल
गई
Faiz Ahmad Faiz
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तुम्हें
इक
मश्वरा
दूँ
सादगी
से
कह
दो
दिल
की
बात
बहुत
तैयारियाँ
करने
में
गाड़ी
छूट
जाती
है
Zubair Ali Tabish
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देखिए
होगा
श्री-कृष्ण
का
दर्शन
क्यूँँ-कर
सीना-ए-तंग
में
दिल
गोपियों
का
है
बेकल
Mohsin Kakorvi
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गले
मिलना
न
मिलना
तो
तेरी
मर्ज़ी
है
लेकिन
तेरे
चेहरे
से
लगता
है
तेरा
दिल
कर
रहा
है
Tehzeeb Hafi
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जब
ज़रा
रात
हुई
और
मह
ओ
अंजुम
आए
बार-हा
दिल
ने
ये
महसूस
किया
तुम
आए
Asad Bhopali
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अगर
हमारे
ही
दिल
में
ठिकाना
चाहिए
था
तो
फिर
तुझे
ज़रा
पहले
बताना
चाहिए
था
Shakeel Jamali
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आप
चाहें
तो
कहीं
और
भी
रह
सकते
हैं
दिल
हमारा
है
तो
मर्ज़ी
भी
हमारी
होगी
Shamsul Hasan ShamS
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किस
तरह
'अमानत'
न
रहूँ
ग़म
से
मैं
दिल-गीर
आँखों
में
फिरा
करती
है
उस्ताद
की
सूरत
Amanat Lakhnavi
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ये
दिल
मिरा
फिर
से
अकेला
रह
गया
सब
जा
चुके
मेले
से
मेला
रह
गया
Manish watan
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हर
मुश्किल
का
हल
है
पैसा
आज
नहीं
तो
कल
है
पैसा
देखो
इस
मैं
इतनी
दम
है
अब
इंसाँ
का
बल
है
पैसा
शौक़
हुए
हैं
पैदा
इतने
जीवन
मैं
बादल
है
पैसा
सब
है
जिसके
पास
वहीं
ये
यार
बहुत
पागल
है
पैसा
गाँव
नहीं
है
भूखा
इसका
शहरों
मैं
तो
जल
है
पैसा
ये
हो
सब
अच्छा
लगता
है
आँखों
का
काजल
है
पैसा
पहले
लोगों
का
कहना
था
रिज़्क़
अधिक
दलदल
है
पैसा
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भाने
लगे
जब
से
दिलों
को
तन
नए
सो
मिट
गए
इस
में
बहुत
जीवन
नए
आशिक़
न
मानेंगे
मिरा
कहना
मगर
रहते
नहीं
घर
में
सदा
दर्पन
नए
ख़ुशियाँ
सभी
हाँ
इश्क़
मैं
मेरी
लगी
मुझको
खले
है
प्यार
के
कंगन
नए
बारिश
नई
उनको
बहुत
अच्छी
लगे
देखे
नहीं
जिसने
कभी
सावन
नए
ये
ज़िंदगी
इस
इश्क़
में
बर्बाद
है
फिर
भी
नहीं
होते
किसी
के
मन
नए
इस
मौत
से
होगी
कभी
शादी
मिरी
होंगे
किसी
के
हम
कभी
साजन
नए
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मतलब
की
बात
करें
तो
मतलब
मिलता
है
हम
यार
किसी
को
चाहें
वो
कब
मिलता
है
झगड़ा
जारी
है
अब
तक
इस
ख़ातिर
उस
सेे
हम
जब
झगड़ा
करते
हैं
वो
तब
मिलता
है
क्या
सबको
हासिल
हो
जाता
है
वो
मालिक
जो
इस
में
बस
जाए
उसको
रब
मिलता
है
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नहीं
हम
तुम
समझते
ख़ामुशी
के
ग़म
तभी
तो
बढ़
रहे
हैं
हर
किसी
के
ग़म
नहीं
आता
किसी
के
काम
कोई
अब
यही
तो
हैं
मियाँ
बस
ज़िंदगी
के
ग़म
जिसे
पाने
कि
ख़ातिर
ज़िंदगी
खो
दी
मुझे
अब
तक
सताते
हैं
उसी
के
ग़म
यहाँ
कोई
न
कोई
रोज़
मरता
है
कभी
होते
नहीं
कम
ख़ुद-कुशी
के
ग़म
मोहब्बत
ही
मियाँ
इक
दुख
नहीं
है
बस
हज़ारों
हैं
यहाँ
पर
आदमी
के
ग़म
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