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Manas Ank
ishq ke silsiloon men guzri hai
ishq ke silsiloon men guzri hai | इश्क़ के सिलसिलों में गुज़री है
- Manas Ank
इश्क़
के
सिलसिलों
में
गुज़री
है
दिल-लगी
हादसों
में
गुज़री
है
कह
रही
सिलवटें
ये
बिस्तर
की
रात
तो
करवटों
में
गुज़री
है
रोना
फिर
कितनी
मुश्किलों
का
है
उम्र
जब
क़हक़हों
में
गुज़री
है
अब
अकेला
रहूँगा
मैं
कैसे
ज़िंदगी
दोस्तों
में
गुज़री
है
- Manas Ank
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उम्र-ए-दराज़
माँग
के
लाई
थी
चार
दिन
दो
आरज़ू
में
कट
गए
दो
इंतिज़ार
में
Seemab Akbarabadi
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उम्र
भर
जिसने
न
माँगा
हो
ख़ुदास
कुछ
भी
उस
ने
बस
तुम
से
मोहब्बत
की
दु'आ
माँगी
है
Shadab Asghar
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बोझ
उठाए
हुए
फिरती
है
हमारा
अब
तक
ऐ
ज़मीं
माँ
तिरी
ये
उम्र
तो
आराम
की
थी
Parveen Shakir
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उसकी
टीस
नहीं
जाती
है
सारी
उम्र
पहला
धोखा
पहला
धोखा
होता
है
Shariq Kaifi
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उम्र
भर
कौन
निभाता
है
त'अल्लुक़
इतना
ऐ
मेरी
जान
के
दुश्मन
तुझे
अल्लाह
रक्खे
Ahmad Faraz
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आप
से
बाद
बिछड़ने
के
खुला
ये
हम
पे
उम्र
तन्हा
ही
गुज़र
जाती,
तो
अच्छा
होता
Chandan Sharma
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क्या
हुआ
जो
मुझे
हम-उम्र
मोहब्बत
न
मिली
मेरी
ख़्वाहिश
भी
यही
थी
कि
बड़ी
आग
लगे
Muzdum Khan
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कुछ
इस
तरह
से
गुज़ारी
है
ज़िन्दगी
जैसे
तमाम
उम्र
किसी
दूसरे
के
घर
में
रहा
Ahmad Faraz
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मैं
ज़िन्दगी
में
आज
पहली
बार
घर
नहीं
गया
मगर
तमाम
रात
दिल
से
माँ
का
डर
नहीं
गया
बस
एक
दुख
जो
मेरे
दिल
से
उम्र
भर
न
जाएगा
उसको
किसी
के
साथ
देख
कर
मैं
मर
नहीं
गया
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Tehzeeb Hafi
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खिलाड़ी
देवकीनंदन
के
जैसा
सामने
हो
तो
तजुर्बा
लाख
हो
शकुनी
भी
चौसर
हार
जाते
हैं
shashwat singh darpan
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रहे
परदेस
में
तुम
को
पता
है
ये
लड़का
प्यार
में
काशी
रहा
है
Manas Ank
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कभी
कुछ
भी
हो
जाए
राम
जाने
हम
उसके
साथ
होते
राम
जाने
Manas Ank
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यहाँ
पर
वो
कितना
अकेला
हुआ
है
किसी
हाथ
का
जो
खिलौना
हुआ
है
जिसे
आप
दिल
में
बसाए
हुए
हो
वो
दिल
से
किसी
के
निकाला
हुआ
है
कि
बचपन
से
लड़के
के
नख़रे
उठाए
जवानी
में
लड़का
नकारा
हुआ
है
गुलाबों
को
देकर
हँसाता
रहा
मैं
अब
उसका
ही
कमरा
बग़ीचा
हुआ
है
जिसे
प्यार
के
ख़त
की
ख़ातिर
थे
लाए
वही
अब
शगुन
का
लिफ़ाफ़ा
हुआ
है
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Manas Ank
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कह
रही
सिलवटें
ये
बिस्तर
की
रात
तो
करवटों
में
गुज़री
है
Manas Ank
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नहीं
चलती
कभी
मर्ज़ी
हमारी
बताओ
तो
ज़रा
ग़लती
हमारी
जहाँ
पर
तैरने
को
कह
रहे
हो
वहीं
पर
डूबी
है
कश्ती
हमारी
यहाँ
भौंरा
कली
को
खा
गया
है
कि
जो'कर
से
मरी
रानी
हमारी
बड़ी
मुश्किल
से
ही
हमको
मिली
थी
उठा
ली
आपने
कुर्सी
हमारी
त'अल्लुक़
आपका
हम
सेे
नहीं
जब
तो
क्यूँ
फिर
चाटते
जूती
हमारी
कुआँ
कब
आएगा
इस
प्यासे
के
पास
कि
रस्ता
देखती
खिड़की
हमारी
बग़ीचे
पर
तुम्हें
इतना
गुमाँ
है
रखो
तुम
फूल
है
तितली
हमारी
बड़ा
महँगा
बताते
थे
हमें
तुम
लगी
बोली
यहाँ
सस्ती
हमारी
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