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Majrooh Sultanpuri
koi ham-dam na raha koi sahaara na raha
koi ham-dam na raha koi sahaara na raha | कोई हम-दम न रहा कोई सहारा न रहा
- Majrooh Sultanpuri
कोई
हम-दम
न
रहा
कोई
सहारा
न
रहा
हम
किसी
के
न
रहे
कोई
हमारा
न
रहा
शाम
तन्हाई
की
है
आएगी
मंज़िल
कैसे
जो
मुझे
राह
दिखा
दे
वही
तारा
न
रहा
ऐ
नज़ारो
न
हँसो
मिल
न
सकूँगा
तुम
से
तुम
मिरे
हो
न
सके
मैं
भी
तुम्हारा
न
रहा
क्या
बताऊँ
मैं
कहाँ
यूँँही
चला
जाता
हूँ
जो
मुझे
फिर
से
बुला
ले
वो
इशारा
न
रहा
- Majrooh Sultanpuri
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सफ़र
हालाँकि
तेरे
साथ
अच्छा
चल
रहा
है
बराबर
से
मगर
एक
और
रास्ता
चल
रहा
है
Shariq Kaifi
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ज़ख़्म
है
दर्द
है
दवा
भी
है
जैसे
जंगल
है
रास्ता
भी
है
यूँँ
तो
वादे
हज़ार
करता
है
और
वो
शख़्स
भूलता
भी
है
हम
को
हर
सू
नज़र
भी
रखनी
है
और
तेरे
पास
बैठना
भी
है
यूँँ
भी
आता
नहीं
मुझे
रोना
और
मातम
की
इब्तिदा
भी
है
चूमने
हैं
पसंद
के
बादल
शाम
होते
ही
लौटना
भी
है
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Karan Sahar
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चाँद
का
फिर
मेरा
रस्ता
देखती
आँखें
तुम्हारी
आज
करवाचौथ
के
दिन
काश
हम
तुम
साथ
होते
Gaurav Singh
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शहर
गुम-सुम
रास्ते
सुनसान
घर
ख़ामोश
हैं
क्या
बला
उतरी
है
क्यूँँ
दीवार-ओ-दर
ख़ामोश
हैं
Azhar Naqvi
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मैं
किस
से
पूछूँ
ये
रस्ता
दुरुस्त
है
कि
ग़लत
जहाँ
से
कोई
गुज़रता
नहीं
वहाँ
हूँ
मैं
Umair Najmi
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सच
बोलने
के
तौर-तरीक़े
नहीं
रहे
पत्थर
बहुत
हैं
शहर
में
शीशे
नहीं
रहे
Nawaz Deobandi
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तिरे
सिवा
भी
कहीं
थी
पनाह
भूल
गए
निकल
के
हम
तिरी
महफ़िल
से
राह
भूल
गए
Majrooh Sultanpuri
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औरों
का
बताया
हुआ
रस्ता
नहीं
चुनते
जो
इश्क़
चुना
करते
हैं,
दुनिया
नहीं
चुनते
Bhaskar Shukla
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मंज़िल
मिली
तो
उसकी
कमी
हमको
खा
गई
सामान
रास्ते
में
जो
खोना
पड़ा
हमें
Abbas Qamar
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काश
वो
रास्ते
में
मिल
जाए
मुझ
को
मुँह
फेर
कर
गुज़रना
है
Fahmi Badayuni
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शब-ए-इंतिज़ार
की
कश्मकश
में
न
पूछ
कैसे
सहर
हुई
कभी
इक
चराग़
जला
दिया
कभी
इक
चराग़
बुझा
दिया
Majrooh Sultanpuri
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बहाने
और
भी
होते
जो
ज़िंदगी
के
लिए
हम
एक
बार
तेरी
आरज़ू
भी
खो
देते
Majrooh Sultanpuri
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हमारे
बाद
अब
महफ़िल
में
अफ़्साने
बयाँ
होंगे
बहारें
हम
को
ढूँढेंगी
न
जाने
हम
कहाँ
होंगे
इसी
अंदाज़
से
झूमेगा
मौसम
गाएगी
दुनिया
मोहब्बत
फिर
हसीं
होगी
नज़ारे
फिर
जवाँ
होंगे
न
हम
होंगे
न
तुम
होगे
न
दिल
होगा
मगर
फिर
भी
हज़ारों
मंज़िलें
होंगी
हज़ारों
कारवाँ
होंगे
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Majrooh Sultanpuri
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ज़बाँ
हमारी
न
समझा
यहाँ
कोई
'मजरूह'
हम
अजनबी
की
तरह
अपने
ही
वतन
में
रहे
Majrooh Sultanpuri
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पहले
सौ
बार
इधर
और
उधर
देखा
है
तब
कहीं
डर
के
तुम्हें
एक
नज़र
देखा
है
Majrooh Sultanpuri
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