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Harsh Kumar Bhatnagar
hosh men aakar bhi kya hi hogaa ab
hosh men aakar bhi kya hi hogaa ab | होश में आकर भी क्या ही होगा अब
- Harsh Kumar Bhatnagar
होश
में
आकर
भी
क्या
ही
होगा
अब
दिल
तो
कहता
फिर
बिगड़
जाएगा
सब
आँखों
को
बहने
दिया
रोका
नहीं
गाँव
में
सैलाब
आ
जाएगा
अब
कोई
दस्तक
दे
गया
फिर
खिड़की
पर
फिर
किसी
को
चुपके
से
देखा
है
अब
- Harsh Kumar Bhatnagar
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वो
शादी
तो
करेगी
मगर
एक
शर्त
पर
हम
हिज्र
में
रहेंगे
अगर
नौकरी
नहीं
Harsh saxena
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मौत
के
साथ
हुई
है
मिरी
शादी
सो
'ज़फ़र'
उम्र
के
आख़िरी
लम्हात
में
दूल्हा
हुआ
मैं
Zafar Iqbal
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आगे
चलकर
जिस
सेे
शादी
करनी
हो
पहले
दिन
से
झूठ
नहीं
कहते
उस
सेे
Tanoj Dadhich
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रुक
गया
है
वो
या
चल
रहा
है
हमको
सब
कुछ
पता
चल
रहा
है
उसने
शादी
भी
की
है
किसी
से
और
गाँव
में
क्या
चल
रहा
है
Tehzeeb Hafi
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एक
अजब
सानेहा
गुज़रा
है
मेरे
माज़ी
में
मेरी
दिलचस्पी
ख़त्म
हो
गई
है
शादी
में
Vishal Singh Tabish
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अब
उसकी
शादी
का
क़िस्सा
न
छेड़ो
बस
इतना
कह
दो
कैसी
लग
रही
थी
Zubair Ali Tabish
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तसव्वुर
तजरबा
तेवर
तमन्ना
और
तन्हाई
मिलेंगे
फूल
सब
इस
में
ग़ज़ल
गुलदान
है
यारों
पढ़ाई
नौकरी
शादी
फिर
उसके
बाद
दो
बच्चे
हमारी
ज़िन्दगी
इतनी
कहाँ
आसान
है
यारों
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Tanoj Dadhich
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कहाँ
रोते
उसे
शादी
के
घर
में
सो
इक
सूनी
सड़क
पर
आ
गए
हम
Shariq Kaifi
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मेहंदी
लगाए
बैठे
हैं
कुछ
इस
अदास
वो
मुट्ठी
में
उन
की
दे
दे
कोई
दिल
निकाल
के
Riyaz Khairabadi
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तुम
भी
शादी
करके
हमको
भूल
गई
हम
भी
नाम
कमाने
में
मसरूफ़
हुए
Tanoj Dadhich
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बग़ैर
इश्क़
मिरा
दिल
धड़क
नहीं
सकता
बिना
ये
रात
के
तारा
चमक
नहीं
सकता
ज़रा
से
फूल
ही
तो
तोड़े
हैं
वो
बच्चे
ने
ज़रा
सी
बात
पे
उसको
झिड़क
नहीं
सकता
मैं
फिर
दुबारा
मोहब्बत
के
रास्तों
पे
हूँ
ये
रास्ता
मैं
दुबारा
भटक
नहीं
सकता
किसी
ने
कूज़ा-गरों
का
है
ध्यान
भटकाया
वगरना
दिल
मिरा
इतना
चटक
नहीं
सकता
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Harsh Kumar Bhatnagar
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तबाह
कर
रही
है
ये
विसाल
की
ख़्वाहिश
सो
इसलिए
नहीं
की
इंतिक़ाल
की
ख़्वाहिश
मैं
तेरे
पास
से
निकलूँगा
शोर
करता
हुआ
तिरे
भी
मन
में
उठेगी
सवाल
की
ख़्वाहिश
मलाल
मुझको
कि
कोई
मलाल
तक
नहीं
है
तो
कैसे
होगी
मुझे
देख-भाल
की
ख़्वाहिश
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Harsh Kumar Bhatnagar
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जो
कुछ
भी
हो
रहा
है
वो
ख़ुदा
की
रहमत
है
किसी
के
दिल
में
ज़ियारत
है
या
तो
ग़ैरत
है
नज़र
घुमा
तो
रहा
हूँ
मैं
उस
की
सम्त
मगर
ये
डर
भी
है
कि
मोहब्बत
बड़ी
मुसीबत
है
मैं
थक
चुका
हूँ
तिरा
इंतिज़ार
करते
हुए
घड़ी
भी
कह
रही
है
तुझ
को
क्या
ज़रूरत
है
मैं
जब
कभी
भी
तिरे
शहरस
गुज़रता
हूँ
तो
याद
आता
है
तू
कितनी
ख़ूब-सूरत
है
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Harsh Kumar Bhatnagar
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कार-ए-इश्क़
से
पहले
ये
दिल
क्या
था
अब्र
में
छुपे
सितारे
के
जैसा
था
तेरे
छूते
ही
सब्ज़
हो
गया
हूँ
मैं
तो
पतझड़
के
मौसम
जैसा
था
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Harsh Kumar Bhatnagar
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तेरी
तस्वीर
रख
कर
ग़ज़ल
लिखता
हूँ
मैं
तो
ऐसे
ही
अक्सर
ग़ज़ल
लिखता
हूँ
शा'इरी
में
उदासी
भी
दिखने
लगी
यार
पर
मैं
तो
हँस
कर
ग़ज़ल
लिखता
हूँ
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Harsh Kumar Bhatnagar
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