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Mahnaz Anjum
bahut ladte ho tum
bahut ladte ho tum | बहुत लड़ते हो तुम
- Mahnaz Anjum
बहुत
लड़ते
हो
तुम
मैं
भी
तुनुक-ताबी
में
ख़ासी
फ़र्द
हूँ
सो
ख़ूब
जमती
है
बहम
अपनी
मैं
मुश्किल
रास्तों
की
गर्द
पलकों
पर
सँभाले
आई
हूँ
तुम
तक
मिरे
नज़दीक
के
हर
मंतक़े
में
तुम
भी
अपने
बालों
की
चाँदी
पे
इतराते
परागंदा
मिज़ाजी
में
गुँधे
उखड़े
हुए
तारों
की
पगडंडी
के
दिल
में
घूमते
हो
मोहब्बत
की
भड़क
लफ़्ज़ों
में
कम
आँखों
की
हलचल
में
ज़ियादा
ले
के
फिरती
हूँ
मिरे
नोकीले
लहजे
की
चुभन
के
उस
तरफ़
दिल
की
बहुत
ही
रेशमी
हद
तक
तुम्हारी
आँख
जाती
है
तअ'ल्लुक़
में
रवादारी
का
नम
जाने
कहाँ
से
आता
है
और
आ
के
हम
दोनों
की
आवेज़िश
की
सब
मुँह-ज़ोरियाँ
ज़ंजीर
करता
है
सुनो
सब
गुफ़्तुगू
के
सिलसिले
मेरी
तुम्हारी
ख़ामुशी
की
भीग
से
सरसब्ज़
रहते
हैं
मिरी
नज़्मों
का
मरकज़
आज
के
पल
की
सजल
दुनिया
में
बस
तुम
हो
तुम्ही
से
बरसर-ए-पैकार
हूँ
और
बे-तहाशा
मुल्तफ़ित
भी
तुम
तआरुज़
के
गुदाज़ों
में
मुझे
देखो
मैं
अपने
दिल
के
तौसन
को
बहुत
सरपट
भगाती
ख़ाक
के
तूफ़ाँ
जगाती
जिस
गुलिस्ताँ
की
तमन्ना
की
डगर
पर
जा
रही
हूँ
उस
की
हद
पर
तुम
उस
की
हद
पर
तुम
कहीं
इक
पेड़
के
पहलू
में
दिल
बन
कर
धड़कते
हो
कहीं
फ़ितरत
के
पेच-ओ-ताब
में
ज़ंजीर
हो
और
धूप
की
यलग़ार
में
मेरे
लिए
छाँव
का
इक
ना-मुख़्ततिम
एहसास
बनते
हो
बहुत
ही
दूर
से
बस
तुम
ही
मुझ
को
साफ़
सुनते
हो
- Mahnaz Anjum
वही
मंज़िलें
वही
दश्त
ओ
दर
तिरे
दिल-ज़दों
के
हैं
राहबर
वही
आरज़ू
वही
जुस्तुजू
वही
राह-ए-पुर-ख़तर-ए-जुनूँ
Noon Meem Rashid
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नींद
के
दायरे
में
हाज़िर
हूँ
ख़्वाब
के
रास्ते
में
हाज़िर
हूँ
याद
है
इश्क़
था
कभी
मुझ
सेे
मैं
उसी
सिलसिले
में
हाज़िर
हूँ
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Ejaz Tawakkal Khan
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उसूली
तौर
पे
मर
जाना
चाहिए
था
मगर
मुझे
सुकून
मिला
है
तुझे
जुदा
कर
के
Ali Zaryoun
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शहर
गुम-सुम
रास्ते
सुनसान
घर
ख़ामोश
हैं
क्या
बला
उतरी
है
क्यूँँ
दीवार-ओ-दर
ख़ामोश
हैं
Azhar Naqvi
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उसे
अभी
भी
मेरे
दिल
के
हाल
का
नहीं
पता
तो
यानी
उसको
अपने
घर
का
रास्ता
नहीं
पता
ये
तेरी
भूल
है
ऐ
मेरे
ख़ुश-ख़याल
के
मुझे
पराई
औरतों
से
तेरा
राब्ता
नहीं
पता
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Ruqayyah Maalik
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रास्ता
सोचते
रहने
से
किधर
बनता
है
सर
में
सौदा
हो
तो
दीवार
में
दर
बनता
है
Jaleel 'Aali'
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कोशिश
भी
कर
उमीद
भी
रख
रास्ता
भी
चुन
फिर
इस
के
ब'अद
थोड़ा
मुक़द्दर
तलाश
कर
Nida Fazli
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बात
करने
का
हसीं
तौर-तरीक़ा
सीखा
हम
ने
उर्दू
के
बहाने
से
सलीक़ा
सीखा
Manish Shukla
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तिरे
सिवा
भी
कहीं
थी
पनाह
भूल
गए
निकल
के
हम
तिरी
महफ़िल
से
राह
भूल
गए
Majrooh Sultanpuri
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सच
की
डगर
पे
जब
भी
रक्खे
क़दम
किसी
ने
पहले
तो
देखी
ग़ुर्बत
फिर
तख़्त-ओ-ताज
देखा
Amaan Pathan
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