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Mahmood Sana
jahaan-e-aarzoo men
jahaan-e-aarzoo men | जहान-ए-आरज़ू में
- Mahmood Sana
जहान-ए-आरज़ू
में
बे-यक़ीनी
के
सभी
मौसम
हमारे
रास्तों
को
धूल
करते
हैं
कोई
इक
आयत-ए-रद्द-ए-बला
जो
ख़ौफ़
से
भिंचे
हुए
जबड़ों
तने
आसाब
को
आसूदगी
बख़्शे
कोई
तो
इस्म-ए-आज़म
हो
कि
शहर-ए-ज़ात
का
ये
दर
खुले
हमारा
डर
खुले
- Mahmood Sana
पूरी
कायनात
में
एक
क़ातिल
बीमारी
की
हवा
हो
गई
वक़्त
ने
कैसा
सितम
ढाया
कि
दूरियाँ
ही
दवा
हो
गईं
Unknown
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बेहतर
है
मेरे
जाम
में
अब
ज़हर
मिला
दो
तुम
यूँँ
तो
मेरी
प्यास
को
कम
कर
नहीं
सकते
Saad Zaigham
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हवा
चली
तो
उसकी
शॉल
मेरी
छत
पे
आ
गिरी
ये
उस
बदन
के
साथ
मेरा
पहला
राब्ता
हुआ
Zia Mazkoor
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सुखा
ली
सबने
ही
आँखें
हवा
ए
ज़िन्दगी
से
यहाँ
अब
भी
वही
रोना
रुलाना
चल
रहा
है
Farhat Ehsaas
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वक़्त
किस
तेज़ी
से
गुज़रा
रोज़-मर्रा
में
'मुनीर'
आज
कल
होता
गया
और
दिन
हवा
होते
गए
Muneer Niyazi
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नए
दौर
के
नए
ख़्वाब
हैं
नए
मौसमों
के
गुलाब
हैं
ये
मोहब्बतों
के
चराग़
हैं
इन्हें
नफ़रतों
की
हवा
न
दे
Bashir Badr
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हम
को
दिल
से
भी
निकाला
गया
फिर
शहरस
भी
हम
को
पत्थर
से
भी
मारा
गया
फिर
ज़हरस
भी
Azm Shakri
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क़सम
देता
है
बच्चों
की,
बहाने
से
बुलाता
है
धुआँ
चिमनी
का
हमको
कारख़ाने
से
बुलाता
है
Munawwar Rana
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मिरे
सूरज
आ!
मिरे
जिस्म
पे
अपना
साया
कर
बड़ी
तेज़
हवा
है
सर्दी
आज
ग़ज़ब
की
है
Shahryar
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सर्द
रात
है
हवा
भी
सोच
मत
पहन
मुझे
सुब्ह
देख
लेंगे
किस
कलर
की
शाल
लेनी
है
Neeraj Neer
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