gar chahte ho zaKHm kii koii zubaan ho | गर चाहते हो ज़ख़्म की कोई ज़बान हो

  - Lalit Pandey
गरचाहतेहोज़ख़्मकीकोईज़बानहो
तोसिर्फ़उसकातीरहोउसकीकमानहो
मैंनेकिताब-ए-ज़िंदगीपूरीसमझलीथी
सोचाहताभीथाकिमेराइम्तिहानहो
येजिसज़मीनपेकईलाशेंहुईंहैंदफ़्न
तुमउसपेचाहतेहोकिअपनामकानहो
मुझकोमिलीहैहिज्रकीसुर्ख़ीजोगालपर
मुमकिनहैदिल-लगीयेतेराहीनिशानहो
मैंअबनहींउड़ूँगातुम्हारीदरारबीच
यायेज़मींमिलेमुझेयावोजहानहो
  - Lalit Pandey
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