kaisa hi dost ho na kahe raaz-e-dil koi | कैसा ही दोस्त हो न कहे राज़-ए-दिल कोई

  - Lala Madhav Ram Jauhar
कैसाहीदोस्तहोकहेराज़-ए-दिलकोई
निकलीजोबातमुँहसेतोफैलीजहानमें
सचसचकहोयेबातबनानानहींपसंद
क्याकहरहेथेग़ैरअभीचुपकेसेकानमें
पूछाहैहाल-ए-ज़ारतोसुनलोख़ता-मुआफ़
कुछबातमेरेहोंटोंमेंहैकुछज़बानमें
आशिक़सेपूछिएसर-ए-बज़्महाल-ए-दिल
पर्देकीबातसुनतेहैंचुपकेसेकानमें
फ़ुर्क़तमेंक्याबताऊँकिदिनहैकिरातहै
आँखोंकोसूझतानहींरोनेकेध्यानमें
क़स्र-ए-जहाँहैतेरेफ़क़ीरोंकाझोंपड़ा
महलोंसेबढ़केचैनहैअपनेमकानमें
दोदिनकीज़िंदगीमेंजोचाहेकोईकरे
रहजातीहैभलाईबुराईजहानमें
  - Lala Madhav Ram Jauhar
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