hote KHuda ke us but-e-kaafir ki chaah ki | होते ख़ुदा के उस बुत-ए-काफ़िर की चाह की

  - Lala Madhav Ram Jauhar
होतेख़ुदाकेउसबुत-ए-काफ़िरकीचाहकी
इतनीतोबातमुझसेहुईहैगुनाहकी
सोज़-ए-दरूँकियाजोमिराशम्अनेबयाँ
जलकरज़बानकाटलीमेरेगवाहकी
भरताहैआजख़ूबतरारेसमंद-ए-नाज़
क़ुमचीहैउनकेहाथमेंज़ुल्फ़-ए-सियाहकी
देखाहुज़ूरकोजोमुकद्दरतोमरगए
हममिटगएजोआपनेमैलीनिगाहकी
फ़ुर्क़तमेंयादआएजोलुत्फ़-ए-शब-ए-विसाल
इकआहभरकेजानिब-ए-गर्दूंनिगाहकी
सुनसानकरदियामिरेपहलूकोलेकेदिल
ज़ालिमनेलूटकरमिरीबस्तीतबाहकी
वोमुझसेकहरहेहैंइशारोंमेंदेखना
सबताड़जाएँगेसर-ए-महफ़िलजोआहकी
हमवोथेदिलहीदिलमेंकियाज़ब्त-ए-राज़-ए-इश्क़
सद
मेंउठाकेमरगएमुँहसेआहकी
अफ़्सोसहैकिमैंतोफिरूँदर-ब-दरख़राब
तुमकोख़बरहोमिरेहाल-ए-तबाहकी
'जौहर'ख़ुदाकेफ़ज़्लसेऐसीग़ज़लकही
शोहरतमुशाइरेमेंहुईवाह-वाहकी
  - Lala Madhav Ram Jauhar
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