हर एक मंज़र-ए-जाँ को बुझा के रख दिया है

  - Kashif Husain Ghair
हरएकमंज़र-ए-जाँकोबुझाकेरखदियाहै
किहमनेइश्क़मुक़ाबिलअनाकेरखदियाहै
किसीतरफ़भीमुझेदेखनेनहींदेता
इसआइनेनेतोपत्थरबनाकेरखदियाहै
बुरेदिनोंमेंकिसीरोज़कामआएगा
सोअच्छेवक़्तमेंकुछज़ह्रलाकेरखदियाहै
वोएकफूलजोरक्खाथामैंनेउसकेलिए
उठायाउसनेमगरमुस्कुराकेरखदियाहै
अजीबशोरथादीवार-ओ-दरभीकाँपउठे
अजीबशोरथामुझकोहिलाकेरखदियाहै
ख़ुदाकाकामथाख़ल्क़-ए-ख़ुदासक्यूँकहते
सोअपनामसअलाआगेख़ुदाकेरखदियाहै
  - Kashif Husain Ghair
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