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Kartik Bhalerao
deta raha sahaara andhere ko raat bhar
deta raha sahaara andhere ko raat bhar | देता रहा सहारा अँधेरे को रात भर
- Kartik Bhalerao
देता
रहा
सहारा
अँधेरे
को
रात
भर
जुगनू
क़फ़स
में
क़ैद
है
इतनी
सी
बात
पर
क़ुदरत
ने
अपनी
जेब
से
सब
कुछ
दिया
तुझे
मारा
है
किस
ने
हक़
तेरा
ख़ुद
ही
तलाश
कर
- Kartik Bhalerao
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देखने
को
आँख
में
इक
सपना
तो
है
मेरा
टूटा
ही
सही
घर
अपना
तो
है
बस
तुझे
ही
देख
कर
मैं
सोचता
हूँ
इस
भरी
दुनिया
में
कोई
अपना
तो
है
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मीर-ए-लश्कर
पे
वार
कौन
करे
ये
हिमाक़त
है
यार
कौन
करे
ये
इनायत
है
आप
की
वर्ना
इस
तमाशे
से
प्यार
कौन
करे
कब
बदल
जाएगी
ये
आब-ओ-हवा
वक़्त
का
एतिबार
कौन
करे
क़ाबिल-ए-एतिबार
आप
कहाँ
आप
को
राज़दार
कौन
करे
काम
दिन
में
भी
हो
मोहब्बत
के
रात
का
इंतिज़ार
कौन
करे
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क़ीमतें
बढ़
रही
हैं
चीज़ों
की
दिन-ब-दिन
लोग
सस्ते
हो
रहे
हैं
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उसने
तो
अपनी
जेब
से
सब
कुछ
दिया
तुझे
मारा
है
किस
ने
हक़
तेरा
ख़ुद
ही
तलाश
कर
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क़दम
रुकते
ही
रस्ते
बोलते
हैं
चलो
तो
लोग
अंधे
बोलते
हैं
हमारे
ज़िंदगी
की
दास्ताँ
तो
हमारे
काले
चश्में
बोलते
हैं
दरख़्तों
का
बढ़ाया
हुस्न
हमने
नए
मौसम
के
पत्ते
बोलते
हैं
फ़रिश्ते
भी
पशेमाँ
होते
है
जब
दिवानों
के
करिश्में
बोलते
हैं
सहारा
दो
मेरी
परवाज़
को
तुम
हवाओं
से
परिंदे
बोलते
हैं
जहाँ
पे
माहिर-ए-गुफ़्तार
चुप
हों
वहाँ
पर
सिर्फ़
गूँगे
बोलते
हैं
ख़मोशी
याद
आती
है
तेरी
जब
दिवाने
पत्थरों
से
बोलते
हैं
सलीक़ा
ही
नहीं
मालूम
हम
को
बड़े
लोगों
से
कैसे
बोलते
हैं
ग़रीबी
सर
झुका
के
कह
रही
थी
अमीरों
के
तो
पैसे
बोलते
हैं
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