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Karan Sahar
tasavvur ne banaya ek saaya
tasavvur ne banaya ek saaya | तसव्वुर ने बनाया एक साया
- Karan Sahar
तसव्वुर
ने
बनाया
एक
साया
फिर
असली
धूप
से
उसने
बचाया
तुझे
इक
ख़्वाब
की
मानिंद
समझा
तुझे
दिन
भर
जिया
शब
भर
सजाया
- Karan Sahar
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बहाने
और
भी
होते
जो
ज़िंदगी
के
लिए
हम
एक
बार
तिरी
आरज़ू
भी
खो
देते
Majrooh Sultanpuri
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सुनहरी
लड़कियों
इनको
मिलो
मिलो
न
मिलो
ग़रीब
होते
हैं
बस
ख़्वाब
देखने
के
लिए
Abbas Tabish
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ऐ
शौक़-ए-नज़ारा
क्या
कहिए
नज़रों
में
कोई
सूरत
ही
नहीं
ऐ
ज़ौक़-ए-तसव्वुर
क्या
कीजे
हम
सूरत-ए-जानाँ
भूल
गए
Asrar Ul Haq Majaz
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ऐसा
है
कि
सब
ख़्वाब
मुसलसल
नहीं
होते
जो
आज
तो
होते
हैं
मगर
कल
नहीं
होते
Ahmad Faraz
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जब
भी
कश्ती
मिरी
सैलाब
में
आ
जाती
है
माँ
दु'आ
करती
हुई
ख़्वाब
में
आ
जाती
है
Munawwar Rana
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तलब
करें
तो
ये
आँखें
भी
इन
को
दे
दूँ
मैं
मगर
ये
लोग
इन
आँखों
के
ख़्वाब
माँगते
हैं
Abbas rizvi
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नए
दौर
के
नए
ख़्वाब
हैं
नए
मौसमों
के
गुलाब
हैं
ये
मोहब्बतों
के
चराग़
हैं
इन्हें
नफ़रतों
की
हवा
न
दे
Bashir Badr
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हर
एक
शख़्स
यहाँ
महव-ए-ख़्वाब
लगता
है
किसी
ने
हम
को
जगाया
नहीं
बहुत
दिन
से
Azhar Iqbal
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ख़िलाफ़-ए-शर्त-ए-अना
था
वो
ख़्वाब
में
भी
मिले
मैं
नींद
नींद
को
तरसा
मगर
नहीं
सोया
ख़िलाफ़-ए-मौसम-ए-दिल
था
कि
थम
गई
बारिश
ख़िलाफ़-ए-ग़ुर्बत-ए-ग़म
है
कि
मैं
नहीं
रोया
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Khalil Ur Rehman Qamar
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हमको
हमारी
नींद
भी
वापस
नहीं
मिली
लोगों
को
उनके
ख़्वाब
जगा
कर
दिए
गए
Imran Aami
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दूर
सहरा
में
जा
के
सोऍंगे
नींद
को
आज़मा
के
सोऍंगे
ख़्वाब
बरसों
जगा
के
रखते
हैं
ख़वाब
से
बच
बचा
के
सोऍंगे
आदमी
वक़्त
पर
नहीं
उठता
हम
परिंदों
में
जा
के
सोऍंगे
तुम
चराग़ों
से
गुफ़्तगू
करना
हम
तो
चादर
चढ़ा
के
सोऍंगे
शोर
हो
भीड़
हो
कि
जंगल
हो
यार
हम
कुल
मिला
के
सोऍंगे
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Karan Sahar
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पहले
तो
इस
हिज्र
ने
जम
कर
बारिश
की
फिर
बारिश
में
मोर
नचाया
यादों
ने
Karan Sahar
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रिश्तों
में
गुफ़्तगू
का
फ़्लेवर
भी
चाहिए
दीवार
उठ
चुकी
है
सो
अब
दर
भी
चाहिए
दिल
भी
लगा
लिया
है
नई
नौकरी
भी
है
हालात
कह
रहे
हैं
कि
अब
घर
भी
चाहिए
उसकी
निगाह-ए-नाज़
में
आने
के
वास्ते
मेहनत
के
साथ
साथ
मुक़द्दर
भी
चाहिए
हम
सब
उदासियों
से
भरे
लोग
हैं
सहर
हमको
वफ़ा
भी
चाहिए
ठोकर
भी
चाहिए
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Karan Sahar
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उसकी
निगाह-ए-नाज़
में
आने
के
वास्ते
मेहनत
के
साथ-साथ
मुक़द्दर
भी
चाहिए
Karan Sahar
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नया
इक
ज़ख़्म
खाना
चाहता
हूँ
सबब
लेकिन
पुराना
चाहता
हूँ
तुम्हें
कैसे
ख़बर
पहुँचे
कि
अब
भी
मैं
तुमको
याद
आना
चाहता
हूँ
हमारे
दरमियाँ
जो
फ़ासिला
है
मैं
उस
पर
पुल
बनाना
चाहता
हूँ
यही
मौक़ा'
है
मेरे
घर
जला
दो
मैं
हिजरत
का
बहाना
चाहता
हूँ
मुसलसल
अपनी
साँसें
ख़र्च
कर
के
तेरी
यादें
कमाना
चाहता
हूँ
ख़ुदाया
मैं
तेरे
उजड़े
चमन
से
निकलने
का
बहाना
चाहता
हूँ
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Karan Sahar
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