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Karan Sahar
aap rone lage hain sargam men
aap rone lage hain sargam men | आप रोने लगे हैं सरगम में
- Karan Sahar
आप
रोने
लगे
हैं
सरगम
में
इस
क़दर
खो
गए
हैं
मातम
में
हिज्र
का
दुख,
विसाल
के
आँसू
लुत्फ़
है
दो
नदी
के
संगम
में
इश्क़
इक
मोजज़ा
सा
लगता
है
फूल
खिलते
हैं
ज़र्द
मौसम
में
शब
की
तारीकियाँ
बताएँगी
कितने
आँसू
छिपे
हैं
शबनम
में
- Karan Sahar
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दूरी
हुई
तो
उन
सेे
क़रीब
और
हम
हुए
ये
कैसे
फ़ासले
थे
जो
बढ़ने
से
कम
हुए
Waseem Barelvi
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दिल
हिज्र
के
दर्द
से
बोझल
है
अब
आन
मिलो
तो
बेहतर
हो
इस
बात
से
हम
को
क्या
मतलब
ये
कैसे
हो
ये
क्यूँँकर
हो
Ibn E Insha
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मैं
अपनी
हिजरत
का
हाल
लगभग
बता
चुका
था
सभी
को
और
बस
तिरे
मोहल्ले
के
सारे
लड़के
हवा
बनाने
में
लग
गए
थे
Vikram Gaur Vairagi
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ये
कब
कहा
था
मुझे
हमनवा
नहीं
देना
मगर
हाँ
फिर
से
वही
बे-वफ़ा
नहीं
देना
मैं
टूट
जाऊँ
तो
आकर
गले
लगा
लेना
कोई
दलील
कोई
मशवरा
नहीं
देना
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Saurabh Sharma 'sadaf'
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ईद
का
दिन
तो
है
मगर
'जाफ़र'
मैं
अकेले
तो
हँस
नहीं
सकता
Jaafar Sahni
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किसी
से
दूरी
बनाई
किसी
के
पास
रहे
हज़ार
कोशिशें
कर
लीं
मगर,
उदास
रहे
Sawan Shukla
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तुम
पूछो
और
मैं
न
बताऊँ
ऐसे
तो
हालात
नहीं
एक
ज़रा
सा
दिल
टूटा
है
और
तो
कोई
बात
नहीं
Qateel Shifai
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हिज्र
में
अब
वो
रात
हुई
है
जिस
में
मुझको
ख़्वाबों
में
रेल
की
पटरी,
चाकू,
रस्सी,
बहती
नदियाँ
दिखती
हैं
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Dipendra Singh 'Raaz'
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ख़ुद
चले
आओ
या
बुला
भेजो
रात
अकेले
बसर
नहीं
होती
Aziz Lakhnavi
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उसे
समझने
का
कोई
तो
रास्ता
निकले
मैं
चाहता
भी
यही
था
वो
बे-वफ़ा
निकले
Waseem Barelvi
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उसकी
निगाह-ए-नाज़
में
आने
के
वास्ते
मेहनत
के
साथ-साथ
मुक़द्दर
भी
चाहिए
Karan Sahar
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रिश्तों
में
गुफ़्तगू
का
फ़्लेवर
भी
चाहिए
दीवार
उठ
चुकी
है
सो
अब
दर
भी
चाहिए
दिल
भी
लगा
लिया
है
नई
नौकरी
भी
है
हालात
कह
रहे
हैं
कि
अब
घर
भी
चाहिए
उसकी
निगाह-ए-नाज़
में
आने
के
वास्ते
मेहनत
के
साथ
साथ
मुक़द्दर
भी
चाहिए
हम
सब
उदासियों
से
भरे
लोग
हैं
सहर
हमको
वफ़ा
भी
चाहिए
ठोकर
भी
चाहिए
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Karan Sahar
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फिर
उन
सेे
दिल
लगा
कर
देखते
हैं
नए
रिश्ते
बना
कर
देखते
हैं
बड़ा
ज़रख़ेज़
है
दामन
तुम्हारा
कोई
आँसू
गिरा
कर
देखते
हैं
नए
तो
कुछ
नहीं
लगते
कि
जब
हम
पुराने
ग़म
उठा
कर
देखते
हैं
ये
किसके
नूर
से
रौशन
है
कमरा
चराग़ों
को
बुझा
कर
देखते
हैं
ग़ज़ल
में
कुछ
कमी
सी
लग
रही
है
तुम्हें
शे'रों
में
ला
कर
देखते
हैं
मज़े
की
बात
ये
है
फूल
भी
अब
तुम्हें
ही
मुस्कुरा
कर
देखते
हैं
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Karan Sahar
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तेरे
बारे
में
क्या
नहीं
कहते
बस
तेरे
मुँह
पे
जा
नहीं
कहते
जो
हमें
ख़ुदस
दूर
ले
जाए
हम
उसे
रास्ता
नहीं
कहते
आप
हैं
तो
अगरचे
फिर
भी
हम
आपको
बे-वफ़ा
नहीं
कहते
चाहे
जितने
बुरे
त'अल्लुक़
हों
जाने
वाले
को
जा
नहीं
कहते
सारी
बातें
सुनी
सुनाई
हैं
आप
कुछ
भी
नया
नहीं
कहते
यूँँ
तो
हम
हिज्र
के
पुजारी
हैं
वस्ल
को
भी
बुरा
नहीं
कहते
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Karan Sahar
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ज़ख़्म
है
दर्द
है
दवा
भी
है
जैसे
जंगल
है
रास्ता
भी
है
यूँँ
तो
वादे
हज़ार
करता
है
और
वो
शख़्स
भूलता
भी
है
हम
को
हर
सू
नज़र
भी
रखनी
है
और
तेरे
पास
बैठना
भी
है
यूँँ
भी
आता
नहीं
मुझे
रोना
और
मातम
की
इब्तिदा
भी
है
चूमने
हैं
पसंद
के
बादल
शाम
होते
ही
लौटना
भी
है
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Karan Sahar
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