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Karal 'Maahi'
kab kisi ko khala hai maikhaana
kab kisi ko khala hai maikhaana | कब किसी को ख़ला है मयख़ाना
- Karal 'Maahi'
कब
किसी
को
ख़ला
है
मयख़ाना
जान-ओ-दिल
बन
गया
है
मयख़ाना
तेरे
बीमार
का
पता
क्या
है
उसने
हँस
कर
कहा
है
मयख़ाना
ये
न
दैर-ओ-हरम
न
काबा
है
क्या
बताऊँ
कि
क्या
है
मयख़ाना
दीन-ओ-मज़हब
न
कोई
पूछे
वहाँ
क़ाफ़िरों
का
पता
है
मयख़ाना
आप
तहज़ीब
से
यहाँ
बैठें
घर
नहीं
आपका
है
मयख़ाना
चल
पड़े
यार
कुछ
पुराने
मगर
क्या
किसीको
पता
है
मयख़ाना
कोई
तन्हा
नहीं
यहाँ
'माही'
सब
को
इक
क़ाफ़िला
है
मयख़ाना
- Karal 'Maahi'
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रक़ीब
भी
है
हबीब
भी
है
ये
दिल
मिरा
कुछ
अजीब
ही
है
नई
सदी
में
जिए
पुरानी
ख़ुमार-ए-ग़ालिब
ग़ज़ल
कही
है
नहीं
कहीं
कुछ
रहा
है
बाक़ी
हुनर
मिरा
अब
नसीब
भी
है
गुनाह
है
इक
अदीब
होना
तबाहियाँ
क्यूँँ
नजीब
सी
है
लिबास
'माही'
धरे
फ़क़ीरी
महल
में
भी
जो
गरीब
ही
है
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ला-मुतमइन
है
वो
जिसे
दिल
खोल
कर
मिला
'माही'
कहे
सुनो
है
कोई
हुन
सा
बद-नसीब
बैठे
बिठाए
दिल
ही
ने
यक-दम
कहा
मुझे
'माही'
ग़ज़ल
का
क़ाफ़िया
तू
चुन
सा
बद-नसीब
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धुआँ
सा
ही
सही
है
जोश
अब
भी
कुछ
रहा
बाक़ी
है
मुझ
में
होश
अब
भी
कुछ
मिलन
की
आस
आँखों
में
बसा
कर
वो
कहे
क्या
है
बचा
तन-गोश
अब
भी
कुछ
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नक़द
करूँँगा
मैं
ख़र्च
ख़ुदको
के
फिर
न
कोई
रसीद
लूँगा
तिरा
हर
इक
नाज़नीं
तसव्वुर
मैं
धड़कनों
में
ख़रीद
लूँगा
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काम
कोई
न
मेरा
बना
आज
तक
हर
दु'आ
बद-दुआ
बे-असर
ही
रही
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