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Karal 'Maahi'
Din gin ke kata saal hai mera tere pichhe
दिन गिन के कटा साल है मेरा तिरे पीछे
- Karal 'Maahi'
दिन
गिन
के
कटा
साल
है
मेरा
तिरे
पीछे
मत
पूछ
कि
क्या
हाल
है
मेरा
तिरे
पीछे
उठता
है
जिगर
से
जो
धुआँ
होने
को
हूँ
राख़
कम
ख़ाक
से
दर-हाल
है
मेरा
तिरे
पीछे
जीने
को
जिए
जाता
हूँ
मैं
बन
के
सुख़नवर
ग़ज़लों
में
छिपा
हाल
है
मेरा
तिरे
पीछे
इतनी
है
दु'आ
पूछे
ज़माना
तुझे
ये
बात
दीवानों
सा
क्यूँँ
हाल
है
मेरा
तिरे
पीछे
- Karal 'Maahi'
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तेरे
तबस्सुम
की
मुझे
सब
रंजिशें
अच्छी
लगी
वो
आसमानी
चाहतों
की
बंदिशें
अच्छी
लगी
वादे
बहुत
से
थे
हमारे
और
तुम्हारे
दरमियाँ
पर
ना-मुकम्मल
बे-तकल्लुफ़
गर्दिशें
अच्छी
लगी
तेरी
अदा
की
सादगी
मक़बूल
है
चारों
तरफ़
उस
पर
बुनी
मेरे
लिए
जो
साज़िशें
अच्छी
लगी
नाकामियाँ
शामिल
रही
हर
इक
गिरह
के
साथ
में
बस
इक
तिरे
'माही'
को
हारी
कोशिशें
अच्छी
लगी
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हुस्न
नसीहत
इश्क़
इबादत
मेरे
लिए
सौदाई
है
तुम
माहिर
हो
सब
में
जानाँ
ग़ज़ब
क़लंदरकारी
है
Karal 'Maahi'
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था
हर
वरक़
कतीब
कि
माशूक़
पा
लिया
ऐसा
मिरा
हबीब
कि
माशूक़
पा
लिया
सोहबत
मिली
तो
ख़ूब
नुमायाँ
हुआ
कलाम
उजला
मिरा
नसीब
कि
माशूक़
पा
लिया
था
में
पयाम-ए-दिल
वो
मुझे
मोड़
पर
मिला
कैसे
कहे
गरीब
कि
माशूक़
पा
लिया
बे-होश
था
तबीब
मिरा
था
पराए
मुल्क
कुछ
तो
हुआ
अजीब
कि
माशूक़
पा
लिया
उसको
मिरा
ख़ुलूस
बड़ा
नागवार
था
उस
पर
मिरा
रक़ीब
कि
माशूक़
पा
लिया
इक
तिफ़्ल
था
न
इल्म
न
कोई
सुलूक
था
माही
हुआ
अदीब
की
माशूक़
पा
लिया
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धुआँ
सा
ही
सही
है
जोश
अब
भी
कुछ
रहा
बाक़ी
है
मुझ
में
होश
अब
भी
कुछ
मिलन
की
आस
आँखों
में
बसा
कर
वो
कहे
क्या
है
बचा
तन-गोश
अब
भी
कुछ
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भुला
क्यूँँ
नहीं
पा
रहा
मैं
ख़ुदाया
नुमायाँ
वो
पिस्तान
उन
पर
मिरे
लब
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