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Kamal Upadhyay
vo jo astronaut
vo jo astronaut | वो जो एस्ट्रोनॅाट
- Kamal Upadhyay
वो
जो
एस्ट्रोनॅाट
चाँद
से
आए
हैं
पता
नहीं
कहा
से
झूटी
तस्वीरें
लाए
हैं
कोई
बता
दो
उन
को
कोई
बता
दो
उन
को
मेरा
चाँद
कैसा
दिखता
है
कभी
देखना
पूनम
की
रात
में
एक
धुंदली
धुंदली
सी
छवी
नज़र
आएगी
जैसे
कोई
बच्चा
माँ
स
लिपटा
हो
वो
जो
एस्ट्रोनॅाट
चाँद
से
आए
हैं
पता
नहीं
कहाँ
से
झूटी
तस्वीरें
लाए
हैं
कहते
हैं
चाँद
मरुस्थल
हैं
अरे
मैं
ने
तो
कई
रातें
चाँद
के
पानी
से
पी
कर
गुज़ार
दी
एक
रात
बाढ़
आ
गई
चाँद
पर
सुब्ह
गीला
तकिया
मैं
ने
धूप
में
सुखाया
था
वो
जो
एस्ट्रोनॅाट
चाँद
से
आए
हैं
पता
नहीं
कहा
से
झूटी
तस्वीरें
लाए
हैं
चाँद
की
बदलती
चाँदनी
से
कई
दिल
जुड़े
हैं
वो
चाँद
की
अठखेलियों
को
कोई
विग्यान
बताते
हैं
कहते
हैं
एक
उपग्रह
है
अरे
हम
तो
बचपन
स
मामा
कहते
हैं
वो
जो
एस्ट्रोनॅाट
चाँद
से
आए
हैं
पता
नहीं
कहा
से
झूटी
तस्वीरें
लाए
हैं
वो
जो
शरमा
के
पल
भर
के
लिए
छुप
जाता
है
उसे
ऐ
चंद्र
पर
ग्रहन
कहते
हैं
उन्हें
क्या
पता
कैसे
गुज़ारता
हूँ
मैं
अमावस
की
रातें
बिना
उस
के
वो
जो
एस्ट्रोनॅाट
चाँद
से
आए
हैं
पता
नहीं
कहा
से
झूटी
तस्वीरें
लाए
हैं
मुझे
लगता
किसी
ग़लत
पते
पर
चले
गए
थे
ऐ
एस्ट्रोनॅाट
और
चाँद
से
है
उन
की
पुरानी
दुश्मनी
इस
लिए
सारा
दोश
चाँद
को
देते
हैं
वो
जो
एस्ट्रोनॅाट
चाँद
से
आए
हैं
पता
नहीं
कहा
से
झूटी
तस्वीरें
लाए
हैं
वो
जो
एस्ट्रोनॅाट
चाँद
से
आए
हैं
पता
नहीं
कहा
से
झूटी
तस्वीरें
लाए
हैं
- Kamal Upadhyay
दश्त
छोड़े
हुए
अब
तो
अर्सा
हुआ
मैं
हूँ
मजनूँ
मगर
नाम
बदला
हुआ
मुझको
औरत
के
दुख
भी
पता
हैं
कि
मैं
एक
लड़का
हूँ
बेवा
का
पाला
हुआ
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Rishabh Sharma
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जो
दोस्त
हैं
वो
माँगते
हैं
सुलह
की
दु'आ
दुश्मन
ये
चाहते
हैं
कि
आपस
में
जंग
हो
Lala Madhav Ram Jauhar
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तेरा
बनता
था
कि
तू
दुश्मन
हो
अपने
हाथों
से
खिलाया
था
तुझे
तेरी
गाली
से
मुझे
याद
आया
कितने
तानों
से
बचाया
था
तुझे
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Ali Zaryoun
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अब
दोस्त
कोई
लाओ
मुक़ाबिल
में
हमारे
दुश्मन
तो
कोई
क़द
के
बराबर
नहीं
निकला
Munawwar Rana
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दुश्मनी
का
सफ़र
इक
क़दम
दो
क़दम
तुम
भी
थक
जाओगे
हम
भी
थक
जाएँगे
Bashir Badr
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कुछ
बात
है
कि
हस्ती
मिटती
नहीं
हमारी
सदियों
रहा
है
दुश्मन
दौर-ए-ज़माँ
हमारा
Allama Iqbal
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कच्चा
सा
घर
और
उस
पर
जोरों
की
बरसात
है
ये
तो
कोई
खानदानी
दुश्मनी
की
बात
है
Saahir
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इज़हार-ए-इश्क़
उस
से
न
करना
था
'शेफ़्ता'
ये
क्या
किया
कि
दोस्त
को
दुश्मन
बना
दिया
Mustafa Khan Shefta
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ख़ास
तो
कुछ
भी
नहीं
बदला
तुम्हारे
बाद
में
पहले
गुम
रहता
था
तुम
में,
अब
तुम्हारी
याद
में
मोल
हासिल
हो
गया
है
मुझको
इक-इक
शे'र
का
सब
दिलासे
दे
रहे
हैं
मुझको
"जस्सर"
दाद
में
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Avtar Singh Jasser
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मेरी
ही
जान
के
दुश्मन
हैं
नसीहत
वाले
मुझ
को
समझाते
हैं
उन
को
नहीं
समझाते
हैं
Lala Madhav Ram Jauhar
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