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Kamal Upadhyay
kyun nahin sone dete mujh ko
kyun nahin sone dete mujh ko | क्यूँँ नहीं सोने देते मुझ को
- Kamal Upadhyay
क्यूँँ
नहीं
सोने
देते
मुझ
को
जब
ज़िंदा
था
तब
पर
भी
यही
करते
थे
यहाँ
तो
सुकून
दो
मुझे
हर
रोज़
चले
आते
हो
दफ़नाने
एक
मुर्दा
लाश
को
ज़िंदा
कर
जाते
हो
अभी
तो
गला
नहीं
मैं
पूरी
तरह
सुना
है
कुछ
दिन
में
खोद
कर
मुझ
को
एक
छोटे
बक्से
में
भर
दोगे
अब
यही
बचा
है
मुर्दों
को
भी
चैन
की
साँस
ना
लेने
देना
वो
जो
क्रॉस
मेरे
सीने
पर
लगाया
है
हटा
दो
उसे
चुभता
है
मुझे
करवट
भी
नहीं
ले
पाता
क्यूँँकि
जगह
कम
है
यहाँ
पड़ोस
की
क़ब्र
में
एक
नया
मुसाफ़िर
आया
है
बड़ा
ख़ुश-मिज़ाज
है
कहता
है
ये
ज़िंदगी
जीने
में
बड़ा
मज़ा
आता
है
अब
मना
कर
दो
लोगों
को
ना
जलाया
करे
मोम-बत्ती
उस
की
पिघलती
बूँदें
जब
गिरती
है
मेरे
ऊपर
तो
छाले
निकल
आते
हैं
चलो
अब
चलता
हूँ
आज
सारी
रात
जाग
कर
काट
दी
चलो
अब
चल
कर
सोता
हूँ
- Kamal Upadhyay
ये
हवा
सारे
चराग़ों
को
उड़ा
ले
जाएगी
रात
ढलने
तक
यहाँ
सब
कुछ
धुआँ
हो
जाएगा
Naseer Turabi
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बिगड़
गई
थी
जो
दुनिया
सॅंवार
दी
हमने
चढ़ा
के
सर
पे
मुहब्बत
उतार
दी
हमने
अँधेरी
रात
किसी
बे-वफ़ा
की
यादों
में
बहुत
तवील
थी
लेकिन
गुज़ार
दी
हमने
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Hameed Sarwar Bahraichi
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चाँद
तारे
इक
दिया
और
रात
का
कोमल
बदन
सुब्ह-दम
बिखरे
पड़े
थे
चार
सू
मेरी
तरह
Aziz Nabeel
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अभी
हमको
मुनासिब
आप
होते
से
नहीं
लगते
ब–चश्म–ए–तर
मुख़ातिब
हैं
प
रोते
से
नहीं
लगते
वही
दर्या
बहुत
गहरा
वही
तैराक
हम
अच्छे
हुआ
है
दफ़्न
मोती
अब
कि
गोते
से
नहीं
लगते
ये
आई
रात
आँखों
को
चलो
खूँ–खूँ
किया
जाए
बदन
ये
सो
भी
जाए
आँख
सोते
से
नहीं
लगते
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Dhiraj Singh 'Tahammul'
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कब
ठहरेगा
दर्द
ऐ
दिल
कब
रात
बसर
होगी
सुनते
थे
वो
आएँगे
सुनते
थे
सहर
होगी
Faiz Ahmad Faiz
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सूरज
लिहाफ़
ओढ़
के
सोया
तमाम
रात
सर्दी
से
इक
परिंदा
दरीचे
में
मर
गया
Athar nasik
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दिन
में
मिल
लेते
कहीं
रात
ज़रूरी
थी
क्या?
बेनतीजा
ये
मुलाक़ात
ज़रूरी
थी
क्या
मुझ
सेे
कहते
तो
मैं
आँखों
में
बुला
लेता
तुम्हें
भीगने
के
लिए
बरसात
ज़रूरी
थी
क्या
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Abrar Kashif
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दिन
रात
मय-कदे
में
गुज़रती
थी
ज़िंदगी
'अख़्तर'
वो
बे-ख़ुदी
के
ज़माने
किधर
गए
Akhtar Shirani
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सिगरटें
चाय
धुआँ
रात
गए
तक
बहसें
और
कोई
फूल
सा
आँचल
कहीं
नम
होता
है
Wali Aasi
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खुलती
है
मेरी
नींद
हर
इक
रात
दो
बजे
इक
रात
दो
बजे
मुझे
छोड़ा
था
आपने
Tanoj Dadhich
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