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"Nadeem khan' Kaavish"
samandar men bhi vo ravaani nahin hain
samandar men bhi vo ravaani nahin hain | समुंदर में भी वो रवानी नहीं हैं
- "Nadeem khan' Kaavish"
समुंदर
में
भी
वो
रवानी
नहीं
हैं
डूबो
दे
ये
इतना
भी
पानी
नहीं
है
- "Nadeem khan' Kaavish"
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दोस्त
अपना
हक़
अदा
करने
लगे
बेवफ़ाई
हमनवा
करने
लगे
मेरे
घर
से
एक
चिंगारी
उठी
पेड़
पत्ते
सब
हवा
करने
लगे
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Santosh S Singh
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ये
जिस्म
तंग
है
सीने
में
भी
लहू
कम
है
दिल
अब
वो
फूल
है
जिस
में
कि
रंग-ओ-बू
कम
है
Pallav Mishra
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ज़ख़्म
है
दर्द
है
दवा
भी
है
जैसे
जंगल
है
रास्ता
भी
है
यूँँ
तो
वादे
हज़ार
करता
है
और
वो
शख़्स
भूलता
भी
है
हम
को
हर
सू
नज़र
भी
रखनी
है
और
तेरे
पास
बैठना
भी
है
यूँँ
भी
आता
नहीं
मुझे
रोना
और
मातम
की
इब्तिदा
भी
है
चूमने
हैं
पसंद
के
बादल
शाम
होते
ही
लौटना
भी
है
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Karan Sahar
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दिल
की
चोटों
ने
कभी
चैन
से
रहने
न
दिया
जब
चली
सर्द
हवा
मैं
ने
तुझे
याद
किया
Josh Malihabadi
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मुहब्बत
के
समुंदर
की
कलाकारी
ग़ज़ब
की
है
कि
सब
कुछ
डूब
जाता
है
मगर
तर
कुछ
नहीं
होता
Muntazir Firozabadi
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उड़ाने
पर
जो
आ
जाऊँ
उड़ा
दूँ
होश
दुनिया
के
मगर
मैं
फूल
से
तितली
उड़ा
सकता
नहीं
यारों
Divy Kamaldhwaj
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गुलशन
से
कोई
फूल
मुयस्सर
न
जब
हुआ
तितली
ने
राखी
बाँध
दी
काँटे
की
नोक
पर
Unknown
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पूरी
कायनात
में
एक
क़ातिल
बीमारी
की
हवा
हो
गई
वक़्त
ने
कैसा
सितम
ढाया
कि
दूरियाँ
ही
दवा
हो
गईं
Unknown
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कोई
समुंदर,
कोई
नदी
होती
कोई
दरिया
होता
हम
जितने
प्यासे
थे
हमारा
एक
गिलास
से
क्या
होता
ताने
देने
से
और
हम
पे
शक
करने
से
बेहतर
था
गले
लगा
के
तुमने
हिजरत
का
दुख
बाट
लिया
होता
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Tehzeeb Hafi
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फूल
ही
फूल
याद
आते
हैं
आप
जब
जब
भी
मुस्कुराते
हैं
Sajid Premi
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कभी
शा
में
सुहानी
थीं
कभी
सूरज
इशारा
था
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"Nadeem khan' Kaavish"
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सभी
से
यार
उल्फ़त
है
ये
कितनी
गंदी
आदत
है
ज़रा
सोचो
कि
मेरा
दिल
सभी
का
है
सियासत
है
मुझे
पहले
ये
लगता
था
मुहब्बत
ही
इबादत
है
वो
शायर
दिल
की
लड़की
है
मुझे
उस
पर
भी
लानत
है
यही
इक
बात
कहनी
है
मुहब्बत
से
मुहब्बत
है
मुझे
अब
शर्म
आती
है
मुझे
बेहद
ही
हैरत
है
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"Nadeem khan' Kaavish"
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हुस्न-ओ-जमाल
उसका
मुकम्मल
ग़ज़ल
सा
है
इक
तिल
है
रुख़
पे
जैसे
कि
नुक़्ता
लगा
हुआ
"Nadeem khan' Kaavish"
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निकलता
हूँ
कभी
घर
से
तो
ये
दुनिया
नहीं
मिलती
उसी
दुनिया
से
घर
लौटू
तो
घर
पापा
नहीं
मिलते
"Nadeem khan' Kaavish"
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जब
भी
काली
रातों
में
इक
तारा
नीचे
गिरता
है
कोई
टूटा
बिखरा
सपना
सारा
नीचे
गिरता
है
हो
यक़ीं
ख़ुद
पर
तो
यारों
क़ामयाबी
मिलती
है
क्या
कोई
पंछी
कभी
दोबारा
नीचे
गिरता
है
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"Nadeem khan' Kaavish"
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