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"Nadeem khan' Kaavish"
mere watan ko in siyaasi logon ne hi kha liya
mere watan ko in siyaasi logon ne hi kha liya | मेरे वतन को इन सियासी लोगों ने ही खा लिया
- "Nadeem khan' Kaavish"
मेरे
वतन
को
इन
सियासी
लोगों
ने
ही
खा
लिया
ख़बर
में
अब
ख़बर
कहाँ,
वही
दो-चार
रहते
हैं
- "Nadeem khan' Kaavish"
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तुम
ने
किया
है
तुम
ने
इशारा
बहुत
ग़लत
दरिया
बहुत
दुरुस्त
किनारा
बहुत
ग़लत
Nabeel Ahmed Nabeel
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कहीं
से
दुख
तो
कहीं
से
घुटन
उठा
लाए
कहाँ-कहाँ
से
न
दीवानापन
उठा
लाए
अजीब
ख़्वाब
था
देखा
के
दर-ब-दर
हो
कर
हम
अपने
मुल्क
से
अपना
वतन
उठा
लाए
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Farhat Abbas Shah
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कभी
तो
नस्ल-ओ-वतन-परस्ती
की
तीरगी
को
शिकस्त
होगी
कभी
तो
शाम-ए-अलम
मिटेगी
कभी
तो
सुब्ह-ए-ख़ुशी
मिलेगी
Abul mujahid zaid
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मुसलसल
तजरबों
का
है
नतीजा
मैं
दरया
से
किनारा
हो
गया
हूँ
Madan Mohan Danish
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ज़बाँ
हमारी
न
समझा
यहाँ
कोई
'मजरूह'
हम
अजनबी
की
तरह
अपने
ही
वतन
में
रहे
Majrooh Sultanpuri
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ज़हर
खा
खा
कर
गुज़ारा
कर
रहे
हैं
आजकल
ज़िंदगी
तुझ
सेे
किनारा
कर
रहे
हैं
आजकल
तू
बहुत
ही
दिलनशीं
है,
महजबीं
है
तू
मगर
तुझको
अपनाकर
ख़सारा
कर
रहे
हैं
आजकल
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Hameed Sarwar Bahraichi
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मुझे
अपना
किनारा
कम
था
'दानिश'
बढ़ा
ली
मैंने
फिर
गहराई
अपनी
Madan Mohan Danish
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मोहब्बत
की
तो
कोई
हद,
कोई
सरहद
नहीं
होती
हमारे
दरमियाँ
ये
फ़ासले,
कैसे
निकल
आए
Khalid Moin
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गुजर
चुकी
जुल्मते
शब-ए-हिज्र,
पर
बदन
में
वो
तीरगी
है
मैं
जल
मरुंगा
मगर
चिरागों
के
लो
को
मध्यम
नहीं
करूँगा
यह
अहद
लेकर
ही
तुझ
को
सौंपी
थी
मैंने
कलबौ
नजर
की
सरहद
जो
तेरे
हाथों
से
कत्ल
होगा
मैं
उस
का
मातम
नहीं
करूँगा
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Tehzeeb Hafi
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दिल
से
निकलेगी
न
मर
कर
भी
वतन
की
उल्फ़त
मेरी
मिट्टी
से
भी
ख़ुशबू-ए-वफ़ा
आएगी
Lal Chand Falak
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निकलता
हूँ
कभी
घर
से
तो
ये
दुनिया
नहीं
मिलती
उसी
दुनिया
से
घर
लौटू
तो
घर
पापा
नहीं
मिलते
"Nadeem khan' Kaavish"
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बहुत
दिन
से
बहुत
ख़ामोश
हूँ
मैं
मगर
अंदर
से
बेहद
चीख़ता
हूँ
"Nadeem khan' Kaavish"
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समझते
हैं
ये
हाल-ए-दिल
भले
ही
कम
समझते
हैं
अभी
कुछ
दोस्त
ऐसे
हैं
जो
मेरा
ग़म
समझते
हैं
"Nadeem khan' Kaavish"
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नहीं
हैं
ज़रूरत
मुझे
अब
किसी
की
हाँ
जाकर
उसे
ये
बताओ
तो
कोई
"Nadeem khan' Kaavish"
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जिस्म
कोने
में
रखा
रह
गया
था
लाश
डोली
में
बिठा
दी
गई
थी
"Nadeem khan' Kaavish"
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