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"Nadeem khan' Kaavish"
in aankhoñ se aise aise manzar dekhe hain
in aankhoñ se aise aise manzar dekhe hain | इन आँखों से ऐसे ऐसे मंज़र देखे हैं
- "Nadeem khan' Kaavish"
इन
आँखों
से
ऐसे
ऐसे
मंज़र
देखे
हैं
हमने
अपनों
के
हाथों
में
खंज़र
देखे
हैं
- "Nadeem khan' Kaavish"
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मेरे
जिस्म
से
वक़्त
ने
कपड़े
नोच
लिए
मंज़र
मंज़र
ख़ुद
मेरी
पोशाक
हुआ
Azm Shakri
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वो
आँखें
बुझ
चुकी
होंगी
नज़ारा
हो
चुका
होगा
'अली'
वो
शख़्स
अब
दुनिया
को
प्यारा
हो
चुका
होगा
Ali Zaryoun
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दूर
इक
सितारा
है
और
वो
हमारा
है
आँख
तक
नहीं
लगती
कोई
इतना
प्यारा
है
छू
के
देखना
उसको
क्या
अजब
नज़ारा
है
तीर
आते
रहते
थे
फूल
किसने
मारा
है
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Kafeel Rana
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काश
ऐसा
कोई
मंज़र
होता
मेरे
काँधे
पे
तेरा
सर
होता
Tahir Faraz
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ऐ
शौक़-ए-नज़ारा
क्या
कहिए
नज़रों
में
कोई
सूरत
ही
नहीं
ऐ
ज़ौक़-ए-तसव्वुर
क्या
कीजे
हम
सूरत-ए-जानाँ
भूल
गए
Asrar Ul Haq Majaz
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एक
दफ़ा
बस
वापस
मंज़र
ऐसा
हो
हाथ
मेरा
सीधा
और
उल्टा
तेरा
हो
Tanoj Dadhich
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जिस
शाने
पर
सर
रखते
हो
उस
शाने
पर
सो
जाते
हो
जाने
कैसे
दीदावर
हो
हर
मंज़र
में
खो
जाते
हो
Poonam Yadav
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जो
बिस्मिल
बना
दे
वो
क़ातिल
तबस्सुम
जो
क़ातिल
बना
दे
वो
दिलकश
नज़ारा
मोहब्बत
का
भी
खेल
नाज़ुक
है
कितना
नज़र
मिल
गई
आप
जीते
मैं
हारा
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Nushur Wahidi
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कम
अज़
कम
इक
ज़माना
चाहता
हूँ
कि
तुम
को
भूल
जाना
चाहता
हूँ
ख़ुदारा
मुझ
को
तन्हा
छोड़
दीजे
मैं
खुल
कर
मुस्कुराना
चाहता
हूँ
सरासर
आप
हूँ
मद्दे
मुक़ाबिल
ख़ुदी
ख़ुद
को
हराना
चाहता
हूँ
मेरे
हक़
में
उरूस-ए-शब
है
मक़्तल
सो
उस
से
लब
मिलाना
चाहता
हूँ
ये
आलम
है,
कि
अपने
ही
लहू
में
सरासर
डूब
जाना
चाहता
हूँ
सुना
है
तोड़ते
हो
दिल
सभों
का
सो
तुम
से
दिल
लगाना
चाहता
हूँ
उसी
बज़्म-ए-तरब
की
आरज़ू
है
वही
मंज़र
पुराना
चाहता
हूँ
नज़र
से
तीर
फैंको
हो,
सो
मैं
भी
जिगर
पर
तीर
खाना
चाहता
हूँ
चराग़ों
को
पयाम-ए-ख़ामुशी
दे
तेरे
नज़दीक
आना
चाहता
हूँ
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Kazim Rizvi
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कैसे
मंज़र
सामने
आने
लगे
हैं
गाते
गाते
लोग
चिल्लाने
लगे
हैं
Dushyant Kumar
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हमारी
इबादत
भी,आदत
भी
हो
तुम
मेरा
दिन
है
तुम
सेे,
तेरी
रात
हम
सेे
"Nadeem khan' Kaavish"
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मिला
ना
अब
नज़र
को,
बोल
भी
कुछ
क़सम
है
बोल
उल्फ़त
थी,
नहीं
ना
"Nadeem khan' Kaavish"
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आसमाँ
तू
यहाँ
किसलिए
आ
गया
छोड़
दे
ये
ज़मीं
तू
अभी
छोड़
दे
"Nadeem khan' Kaavish"
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यार
तेरी
चीज़
सब
हम
ने
हटा
दी
इस
नज़र
से
फेंक
आया
वो
घड़ी
भी
जो
कि
लाई
थी
शहरस
"Nadeem khan' Kaavish"
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कभी
जो
मैं
तुझे
चूमू
तो
मुझको
रोक
देना
तू
नहीं
तो
फिर
इसे
भी
तू
हवस
का
नाम
दे
देगी
"Nadeem khan' Kaavish"
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