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Kaifi Azmi
haath aa kar laga gaya koi
haath aa kar laga gaya koi | हाथ आ कर लगा गया कोई
- Kaifi Azmi
हाथ
आ
कर
लगा
गया
कोई
मेरा
छप्पर
उठा
गया
कोई
लग
गया
इक
मशीन
में
मैं
भी
शहर
में
ले
के
आ
गया
कोई
मैं
खड़ा
था
कि
पीठ
पर
मेरी
इश्तिहार
इक
लगा
गया
कोई
ये
सदी
धूप
को
तरसती
है
जैसे
सूरज
को
खा
गया
कोई
ऐसी
महँगाई
है
कि
चेहरा
भी
बेच
के
अपना
खा
गया
कोई
अब
वो
अरमान
हैं
न
वो
सपने
सब
कबूतर
उड़ा
गया
कोई
वो
गए
जब
से
ऐसा
लगता
है
छोटा
मोटा
ख़ुदा
गया
कोई
मेरा
बचपन
भी
साथ
ले
आया
गाँव
से
जब
भी
आ
गया
कोई
- Kaifi Azmi
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मैं
बे-ख़याल
कभी
धूप
में
निकल
आऊँ
तो
कुछ
सहाब
मिरे
साथ
साथ
चलते
हैं
Farhat Abbas Shah
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काँटों
से
दिल
लगाओ
जो
ता-उम्र
साथ
दें
फूलों
का
क्या
जो
साँस
की
गर्मी
न
सह
सकें
Akhtar Shirani
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इक
कली
की
पलकों
पर
सर्द
धूप
ठहरी
थी
इश्क़
का
महीना
था
हुस्न
की
दुपहरी
थी
ख़्वाब
याद
आते
हैं
और
फिर
डराते
हैं
जागना
बताता
है
नींद
कितनी
गहरी
थी
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Vikram Gaur Vairagi
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किसी
की
तपिश
में
ख़ुशी
है
किसी
की
किसी
की
ख़लिश
में
मज़ा
है
किसी
का
Unknown
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धूप
में
कौन
किसे
याद
किया
करता
है
पर
तिरे
शहर
में
बरसात
तो
होती
होगी
Ameer Imam
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तुम
सेे
इक
दिन
कहीं
मिलेंगे
हम
ख़र्च
ख़ुद
को
तभी
करेंगे
हम
धूप
निकली
है
तेरी
बातों
की
आज
छत
पर
पड़े
रहेंगे
हम
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Swapnil Tiwari
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धूप
को
साया
ज़मीं
को
आसमाँ
करती
है
माँ
हाथ
रखकर
मेरे
सर
पर
सायबाँ
करती
है
माँ
मेरी
ख़्वाहिश
और
मेरी
ज़िद
उसके
क़दमों
पर
निसार
हाँ
की
गुंज़ाइश
न
हो
तो
फिर
भी
हाँ
करती
है
माँ
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Nawaz Deobandi
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मुझे
भी
बख़्श
दे
लहजे
की
ख़ुशबयानी
सब
तेरे
असर
में
हैं
अल्फ़ाज़
सब,
म'आनी
सब
मेरे
बदन
को
खिलाती
है
फूल
की
मानिंद
कि
उस
निगाह
में
है
धूप,
छाँव,
पानी
सब
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Subhan Asad
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धूप
में
निकलो
घटाओं
में
नहा
कर
देखो
ज़िंदगी
क्या
है
किताबों
को
हटा
कर
देखो
Nida Fazli
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पहले
ये
काम
बड़े
प्यार
से
माँ
करती
थी
अब
हमें
धूप
जगाती
है
तो
दुख
होता
है
Munawwar Rana
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ग़ुर्बत
की
ठंडी
छाँव
में
याद
आई
उस
की
धूप
क़द्र-ए-वतन
हुई
हमें
तर्क-ए-वतन
के
बाद
Kaifi Azmi
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अपना
पता
मिले
न
ख़बर
यार
की
मिले
दुश्मन
को
भी
न
ऐसी
सज़ा
प्यार
की
मिले
उन
को
ख़ुदा
मिले,
है
ख़ुदा
की
जिन्हें
तलाश
मुझ
को
बस
इक
झलक
मेरे
दिलदार
की
मिले
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Kaifi Azmi
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इंसाँ
की
ख़्वाहिशों
की
कोई
इंतिहा
नहीं
दो
गज़
ज़मीं
भी
चाहिए
दो
गज़
कफ़न
के
बाद
Kaifi Azmi
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कोई
कहता
था
समुंदर
हूँ
मैं
और
मिरी
जेब
में
क़तरा
भी
नहीं
Kaifi Azmi
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कोई
तो
सूद
चुकाए
कोई
तो
ज़िम्मा
ले
उस
इंक़लाब
का
जो
आज
तक
उधार
सा
है
Kaifi Azmi
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