ghazal aisi bhi kya likhni qalam mazdoor ho jaa.e | ग़ज़ल ऐसी भी क्या लिखनी क़लम मज़दूर हो जाए

  - Anand Sharma
ग़ज़लऐसीभीक्यालिखनीक़लममज़दूरहोजाए
लिखोतोफिरलिखोऐसेग़ज़लमशहूरहोजाए
कमानेकेलिएलिखतेहोतोफिरछोड़दोलिखना
कहींग़ज़लोंकाबिकनाभीअबदस्तूरहोजाए
ग़ज़लअक्सरज़मानेमेंअदबकीबातकहतीहै
अदबसेहोग़ज़लबाहरतोना-मंज़ूरहोजाए
ख़ुदाकीशानमेंलिखतेहोपरवोसुननहींपाता
कभीतोशे'रऐसाहोख़ुदामजबूरहोजाए
अनाकीज़दमेंजोशायरउसेसबख़ाकलगतेहैं
मिटायेख़ाकजोशायरउसीमेंचूरहोजाए
चलेजाएँकिसीशायरकेजैसेहमज़मानेसे
दु'आबसयेहमारीहैरज़ामंज़ूरहोजाए
  - Anand Sharma
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