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Javed Aslam
kya khoob raushni ka hai tyaohar dekhiye
kya khoob raushni ka hai tyaohar dekhiye | क्या ख़ूब रौशनी का है त्यौहार देखिए
- Javed Aslam
क्या
ख़ूब
रौशनी
का
है
त्यौहार
देखिए
चारों
तरफ़
नुमायाँ
है
अन्वार
देखिए
- Javed Aslam
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सुख़न-फ़हमों
की
बस्ती
में
सुख़न
की
ज़िन्दगी
कम
है
जहाँ
शाइर
ज़ियादा
हैं
वहाँ
पर
शा'इरी
कम
है
मैं
जुगनू
हूँ
उजाले
में
भला
क्या
अहमियत
मेरी
वहाँ
ले
जाइए
मुझको
जहाँ
पर
रौशनी
कम
है
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Balmohan Pandey
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रुकें
तो
धूप
से
नज़रें
बचाते
रहते
हैं
चलें
तो
कितने
दरख़्त
आते
जाते
रहते
हैं
Charagh Sharma
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धूप
को
साया
ज़मीं
को
आसमाँ
करती
है
माँ
हाथ
रखकर
मेरे
सर
पर
सायबाँ
करती
है
माँ
मेरी
ख़्वाहिश
और
मेरी
ज़िद
उसके
क़दमों
पर
निसार
हाँ
की
गुंज़ाइश
न
हो
तो
फिर
भी
हाँ
करती
है
माँ
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Nawaz Deobandi
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ये
भँवरे
रौशनी
खो
देंगे
अपनी
आँखों
की
अगर
चमन
में
जो
कलियाँ
नक़ाब
ओढेंगी
Shajar Abbas
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रौशनी
आधी
इधर
आधी
उधर
इक
दिया
रक्खा
है
दीवारों
के
बीच
Obaidullah Aleem
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जली
हैं
धूप
में
शक्लें
जो
माहताब
की
थीं
खिंची
हैं
काँटों
पे
जो
पत्तियाँ
गुलाब
की
थीं
Dagh Dehlvi
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कहीं
कोई
चराग़
जलता
है
कुछ
न
कुछ
रौशनी
रहेगी
अभी
Abrar Ahmad
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वो
सर्दियों
की
धूप
की
तरह
ग़ुरूब
हो
गया
लिपट
रही
है
याद
जिस्म
से
लिहाफ़
की
तरह
Musavvir Sabzwari
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धूप
में
निकलो
घटाओं
में
नहा
कर
देखो
ज़िंदगी
क्या
है
किताबों
को
हटा
कर
देखो
Nida Fazli
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प्यार
की
जोत
से
घर
घर
है
चराग़ाँ
वर्ना
एक
भी
शम्अ
न
रौशन
हो
हवा
के
डर
से
Shakeb Jalali
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आप
ने
फेर
ली
नज़र
अपनी
अब
मुझे
ही
नहीं
ख़बर
अपनी
आप
की
तो
कमी
रही
लेकिन
ज़िन्दगी
हो
गई
बसर
अपनी
मुड़
के
देखा
तो
ये
नज़र
आया
कितनी
मुश्किल
थी
ये
डगर
अपनी
शाम
क़िस्मत
में
मेरी
हो
कि
न
हो
शाद
कर
लूँ
मैं
दोपहर
अपनी
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Javed Aslam
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रुख़
हवाओं
का
देख
परवाने
उड़
गए
क्यूँ,
दिया
बुझा
ही
नहीं
Javed Aslam
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चंद
लम्हों
की
शाम
जैसे
थे
जा
के
आना
भी
सीख
लेते
तुम
Javed Aslam
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तुम
मुझे
आज़मा
के
तो
देखो
मुझ
सेे
तुम
दूर
जाके
तो
देखो
तुम
हो
रौशन
मिरी
निगाहों
में
दीप
मेरा
बुझा
के
तो
देखो
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Javed Aslam
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लड़कपन
में
यहाँ
हर
चीज़
लामह़दूद
लगती
थी
बड़े
हो
कर
हुआ
इह़सास
दुनिया
कितनी
छोटी
है
Javed Aslam
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