aagahi ka dukh tum kya jaano | आगही का दुख तुम क्या जानो

  - Janan Malik
आगहीकादुखतुमक्याजानो
किसअज़िय्यतसेगुज़रनापड़ताहै
जबइसकेसाँप
गलेमेंलिपटजातेहैं
औरभींचतेहैं
साँसेंरुकजातीहैं
बारबारफुंकारतेऔरडसतेहैं
सुब्ह-ओ-शामरात-दिन
उनकाज़हररग-ओ-पैमेंउतरजाताहै
मेरेलहूमेंसरायतकरताहै
मैंटूटतीफूटतीरहतीहूँ
काँचकीतरह
रेतकीतरह
खन्खनातीहुईमिट्टीकीतरह
मेरीनसनससेलहूबहताहै
शामहीसेमेरेबिस्तरपरआसनजमालेतेहैं
मुझेसोनेनहींदेते
करवटकरवटमुझेडसतेहैं
लेकिनयेसाँपमैंनेख़ुद
अपनेलहूसेपालेहैं
अपनेवजूदकेअंदर
'शकेब''सरवत'और‘सारा’नेभीपालेथे
उन्हेंभीनींदनहींआतीथी
आख़िर-ए-कारवोरेलकीपटरीपरजाकर
मीठीनींदसोगए
शायदये
रेलकीसीटियोंसेबहुतडरतेहैं
रेलकीपटरीकोपारनहींकरपाते
  - Janan Malik
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Khat Shayari

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