garz rahbar se kya mujh ko gilaa hai jazb-e-kaamil se | ग़रज़ रहबर से क्या मुझ को गिला है जज़्ब-ए-कामिल से

  - Jagat Mohan Lal Ravan
ग़रज़रहबरसेक्यामुझकोगिलाहैजज़्ब-ए-कामिलसे
किजितनाबढ़रहाहूँहटरहाहूँदूरमंज़िलसे
सुकूत-ए-बे-महलतक़रीर-ए-बे-मौक़ाकीतोहमतक्यूँँ
उठानाहोतोयूँँहमकोउठादोअपनीमहफ़िलसे
येअरमान-ए-तरक़्क़ीआजहैदावाख़ुदाईका
उसीदिलकाजोकलतकथालहूकीबूँदमुश्किलसे
गुल-ओ-लालापेआख़िरकररहाहैग़ौरक्यागुलचीं
येवोख़ूँहैजोटपकाथाकभीचश्म-ए-अनादिलसे
शब-ए-महताबदरियाकाकिनाराऔरयेसन्नाटा
तुम्हेंइससाज़परहमख़ुशकरेंगेनग़्मा-ए-दिलसे
ग़ज़बहैजलकेपरवानोंकाउनकीबज़्ममेंकहना
'रवाँ'यायूँँफ़िदाहोजाओयाउठजाओमहफ़िलसे
  - Jagat Mohan Lal Ravan
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