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Ismail Raaz
ab is bhram men har ek raat kaatni hai mujhe
ab is bhram men har ek raat kaatni hai mujhe | अब इस भ्रम में हर एक रात काटनी है मुझे
- Ismail Raaz
अब
इस
भ्रम
में
हर
एक
रात
काटनी
है
मुझे
के
आने
वाली
तेरे
साथ
काटनी
हैं
मुझे
तुझे
दिलाना
है
एहसास
अपने
इस
दुख
का
तू
कुछ
तो
बोल
तेरी
बात
काटनी
है
मुझे
मुझे
तुलू-ए-सहर
की
तसल्लीया
मत
दे
अभी
तो
ये
शब-ए-जुलमात
काटनी
हैं
मुझे
- Ismail Raaz
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क्या
ख़ुशी
में
ज़िंदगी
का
होश
कम
रह
जाएगा
ग़म
अगर
मिट
भी
गया
एहसास-ए-ग़म
रह
जाएगा
Shakeel Badayuni
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जैसे
उदास
करने
मुझे
आई
ईद
हो
तेरे
बगैर
कैसी
मिरी,
माई
ईद
हो
Sayeed Khan
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ग़म-ए-हयात
ने
आवारा
कर
दिया
वर्ना
थी
आरज़ू
कि
तिरे
दर
पे
सुब्ह
ओ
शाम
करें
Majrooh Sultanpuri
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जानता
हूँ
एक
ऐसे
शख़्स
को
मैं
भी
'मुनीर'
ग़म
से
पत्थर
हो
गया
लेकिन
कभी
रोया
नहीं
Muneer Niyazi
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ख़ुशी
में
भी
ख़ुशी
होती
नहीं
अब
तेरा
ग़म
ही
सतह
पर
तैरता
है
Umesh Maurya
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आज
तो
बे-सबब
उदास
है
जी
इश्क़
होता
तो
कोई
बात
भी
थी
Nasir Kazmi
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हाए
उसके
हाथ
पीले
होने
का
ग़म
इतना
रोए
हैं
कि
आँखें
लाल
कर
ली
Harsh saxena
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मुझे
ये
डर
है
तेरी
आरज़ू
न
मिट
जाए
बहुत
दिनों
से
तबीअत
मिरी
उदास
नहीं
Nasir Kazmi
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दुनिया
ने
तेरी
याद
से
बेगाना
कर
दिया
तुझ
से
भी
दिल-फ़रेब
हैं
ग़म
रोज़गार
के
Faiz Ahmad Faiz
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उदासी
का
सबब
उस
सेे
जो
हम
तब
पूछ
लेते
वजह
फिर
पूछनी
पड़ती
न
शायद
ख़ुद-कुशी
की
Dipendra Singh 'Raaz'
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तेरी
गली
को
छोड़
के
पागल
नहीं
गया
रस्सी
तो
जल
गई
है
मगर
बल
नहीं
गया
मजनूँ
की
तरह
छोड़ा
नहीं
मैं
ने
शहर
को
या'नी
मैं
हिज्र
काटने
जंगल
नहीं
गया
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Ismail Raaz
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दरअस्ल
मैंने
मशक़्क़त
नहीं
मोहब्बत
की
हथेलियों
पे
नहीं
मेरे
दिल
पे
छाले
है
Ismail Raaz
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गिरा
पड़ा
के
न
यूँँ
तार
तार
कर
मुझ
को
मिरे
हवाले
ही
कर
दे
पुकार
कर
मुझ
को
मिरी
तलाश
में
कौन
आएगा
मिरे
अंदर
यहीं
पे
फेंक
दिया
जाए
मार
कर
मुझ
को
मैं
जितना
क़ीमती
हूँ
उतना
बद-नसीब
भी
हूँ
वो
सो
रहा
है
गले
से
उतार
कर
मुझ
को
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Ismail Raaz
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बात
ऐसी
भी
भला
आप
में
क्या
रक्खी
है
इक
दिवाने
ने
ज़मीं
सर
पे
उठा
रक्खी
है
इत्तिफ़ाक़न
कहीं
मिल
जाए
तो
कहना
उस
सेे
तेरे
शाइर
ने
बड़ी
धूम
मचा
रक्खी
है
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Ismail Raaz
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ज़रा
सी
देर
को
सकते
में
आ
गए
थे
हम
कि
एक
दूजे
के
रस्ते
में
आ
गए
थे
हम
जो
अपना
हिस्सा
भी
औरों
में
बाँट
देता
है
एक
ऐसे
शख़्स
के
हिस्से
में
आ
गए
थे
हम
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Ismail Raaz
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