ज़ेहन हो तंग तो फिर शोख़ी-ए-अफ़्कार न रख

  - Irfan Siddiqi
ज़ेहनहोतंगतोफिरशोख़ी-ए-अफ़्काररख
बंदतह-ख़ानोंमेंयेदौलत-ए-बेदाररख
ज़ख़्मखानाहीजोठहरातोबदनतेराहै
ख़ौफ़कानाममगरलज़्ज़त-ए-आज़ाररख
एकहीचीज़कोरहनाहैसलामतप्यारे
अबजोसरशानोंपेरक्खाहैतोदीवाररख
ख़्वाहिशेंतोड़डालेंतिरेसीनेकाक़फ़स
इतनेशह-ज़ोरपरिंदोंकोगिरफ़्ताररख
अबमैंचुपहूँतोमुझेअपनीदलीलोंसेकाट
मेरीटूटीहुईतलवारपेतलवाररख
आजसेदिलभीतिरेहालमेंहोताहैशरीक
लेयेहसरतभीमिरीचश्म-ए-गुनहगाररख
वक़्तफिरजानेकहाँउससेमिलादेतुझको
इसक़दरतर्क-ए-मुलाक़ातकापिंदाररख
  - Irfan Siddiqi
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