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Murari Mandal
sahi gar ho nahin paata galat kar de
sahi gar ho nahin paata galat kar de | सही गर हो नहीं पाता ग़लत कर दे,
- Murari Mandal
सही
गर
हो
नहीं
पाता
ग़लत
कर
दे,
मिरे
हक़
में
ग़मों
का
सल्तनत
कर
दे
- Murari Mandal
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इस
गए
साल
बड़े
ज़ुल्म
हुए
हैं
मुझ
पर
ऐ
नए
साल
मसीहा
की
तरह
मिल
मुझ
से
Sarfraz Nawaz
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न
हुआ
नसीब
क़रार-ए-जाँ
हवस-ए-क़रार
भी
अब
नहीं
तिरा
इंतिज़ार
बहुत
किया
तिरा
इंतिज़ार
भी
अब
नहीं
तुझे
क्या
ख़बर
मह-ओ-साल
ने
हमें
कैसे
ज़ख़्म
दिए
यहाँ
तिरी
यादगार
थी
इक
ख़लिश
तिरी
यादगार
भी
अब
नहीं
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Jaun Elia
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सर
पर
हवा-ए-ज़ुल्म
चले
सौ
जतन
के
साथ
अपनी
कुलाह
कज
है
उसी
बाँकपन
के
साथ
Majrooh Sultanpuri
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जाने
क्या
क्या
ज़ुल्म
परिंदे
देख
के
आते
हैं
शाम
ढले
पेड़ों
पर
मर्सिया-ख़्वानी
होती
है
Afzal Khan
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हुस्न
को
भी
कहाँ
नसीब
'जिगर'
वो
जो
इक
शय
मिरी
निगाह
में
है
Jigar Moradabadi
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मैं
ख़ुद
भी
यार
तुझे
भूलने
के
हक़
में
हूँ
मगर
जो
बीच
में
कम-बख़्त
शा'इरी
है
ना
Afzal Khan
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माँ
बाप
और
उस्ताद
सब
हैं
ख़ुदा
की
रहमत
है
रोक-टोक
उन
की
हक़
में
तुम्हारे
नेमत
Altaf Hussain Hali
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यूँँ
ही
थोड़ी
मेरी
गज़लों
में
इतना
दुख
होता
है
इस
दुनिया
ने
हम
लड़कों
से
रोने
का
हक़
छीना
है
Harsh saxena
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हम
अम्न
चाहते
हैं
मगर
ज़ुल्म
के
ख़िलाफ़
गर
जंग
लाज़मी
है
तो
फिर
जंग
ही
सही
Sahir Ludhianvi
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निगाह-ए-गर्म
क्रिसमस
में
भी
रही
हम
पर
हमारे
हक़
में
दिसम्बर
भी
माह-ए-जून
हुआ
Akbar Allahabadi
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सुना
सकता
नहीं
ऐसी
कहानी
है
पुरानी
बात
बस
तुमको
बतानी
है
जिसे
देखूँ
कभी
तो
आँख
रोती
है
मेरे
घर
में
बची
तेरी
निशानी
है
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Murari Mandal
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कैसे
कहें
कितने
पिटे
हैं
यार
हम
तेरी
अदा
पर
मर
मिटे
हैं
यार
हम
Murari Mandal
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महफिलों
में
मुस्कुराते
लोग
हैं
देख
कैसे
ग़म
छुपाते
लोग
हैं
काम
पर
मैं
याद
रहता
हूँ
फ़क़त
बाद
में
फिर
भूल
जाते
लोग
हैं
जोड़
के
तिनका
बनाता
हूँ
महल
और
फिर
उसको
गिराते
लोग
हैं
देख
सपने
और
पूरा
कर
उसे
छोड़
कुछ
भी
बड़-बड़ाते
लोग
हैं
कोई
तो
आया
नहीं
पहले
कभी
अब
तुम्हारे
काम
आते
लोग
हैं
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Murari Mandal
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नहीं
दिखता
किसी
को
ग़म
हमारा
हमीं
से
दूर
हैं
हम
दम
हमारा
कोई
ढूँढ़ो
उसे
जाकर
कहीं
पर
कहाँ
गुम
हो
गया
बालम
हमारा
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Murari Mandal
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किसी
का
जो़र
अब
दिल
पर
नहीं
चलता
चला
भी
जाए
तो
अक्सर
नहीं
चलता
कमाना
भी
ज़रूरी
है
यहाँ
जाना
सुनो
बस
शा'इरी
से
घर
नहीं
चलता
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Murari Mandal
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