jis raah men pech-o-kham nahin haius raah pe kyuuñ haram nahin hai | जिस राह में पेच-ओ-ख़म नहीं है

  - Ijtiba Rizvi
जिसराहमेंपेच-ओ-ख़मनहींहै
उसराहपेक्यूँहरमनहींहै
चलनाहैहमकोचलरहेहैं
मंज़िलक्याहरक़दमनहींहै
सज्दावोहैब-रब्ब-ए-का'बा
जिसकोक़ैद-ए-हरमनहींहै
सारीख़िल्क़तहैसरझुकाए
एकइसगर्दनमेंख़मनहींहै
जन्नतक्याहैहवसकाधोका
क्याहोगीख़ुशीकिग़मनहींहै
सज्दाहैकरिश्मा-ए-तसव्वुर
मतकहकिख़ुदासनमनहींहै
  - Ijtiba Rizvi
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