shaayad ek saath seekhta hai aadmi | शायद एक साथ सीखता है आदमी

  - Iftikhar Bukhari
शायदएकसाथसीखताहैआदमी
चलनाऔरसोचना
एकसहनमें
एकदिन
मैंसीखगया
चलना
औरसोचना
चिड़ियों
पौदों
औररंगबिरंगेकीड़ोंकेदरमियान
माँकहती
तुमइतनाचलतेहो
एकसीधमेंचलो
तोशामतकपहुँचजाओ
किसीऔरशहरमें
मैंनेआवारगीकी
दोपहरोंमें
अकेले
तारोंभरीरातोंमें
उदासशाइ'रों
औरजुगनुओंकेसाथ
मैंचलतारहा
गलियोंमें
शाह-राहोंपर
जुलूसोंमें
जनाज़ोंकेसाथ
सोचतेहुए
ना-इंसाफ़ीइंक़िलाब
मौतख़ुदाऔरजहन्नुम
औरबहुतसीफ़ुज़ूलियात
मैंचलतारहा
बारिशोंमें
बर्फ़-बारियोंमें
धुंदमें
धूपऔरआँधियोंमें
सोचतेहुए
जोमैंबतासकताहूँफ़ख़्रसे
औरवोभी
जोमैंख़ुदसेभीछुपाताहूँ
मैंअजनबीमुल्कोंमेंगया
तन्हाचलनेकेलिए
तन्हासोचनेकेलिए
अबमैंलौटआयाहूँ
ढलतीउम्रमें
बग़ैरकहींपहुँचेहुए
अबमैंकहींनहींजाता
परअबभीचलताहूँ
हररोज़
कम-अज़-कम
एकघंटा
तेज़तेज़
पावँचक्कीपर
येसोचतेहुए
किमैंकबतकचलूँगा
मैंकबतकसोचूँगा
  - Iftikhar Bukhari
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