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SAAGAR SINGH RAJPUT
ham-naam jahaan men kaafi hain tere
ham-naam jahaan men kaafi hain tere | हम-नाम जहाँ में काफ़ी हैं तेरे
- SAAGAR SINGH RAJPUT
हम-नाम
जहाँ
में
काफ़ी
हैं
तेरे
पर
जान
तिरे
जैसा
बस
तू
ही
है
- SAAGAR SINGH RAJPUT
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आज
तुझ
से
सवाल
करते
हैं
ग़म
तिरे
क्यूँँ
निढाल
करते
हैं
मैंने
देखा
है
ये
शरीफ़ों
का
लोग
जीना
मुहाल
करते
हैं
मेरे
दिल
को
है
वस्ल
की
चाहत
और
वो
आज-काल
करते
हैं
जेब
जितनी
भरी
हों
पैसों
से
लोग
उतना
ख़याल
करते
हैं
आज-कल
लोग
पीठ
के
पीछे
सिर्फ़
हैज़ुर-रिजाल
करते
हैं
आप
ये
काम
छोड़
दो
साहिब
इश्क़
तो
नौनिहाल
करते
हैं
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जिसको
मुहब्बत
से
मुहब्बत
है
नहीं
वो
शख़्स
ज़ेहनी
तौर
पे
बीमार
है
उसकी
जबीं
चूमो
उसे
तुम
प्यार
दो
बस
प्यार
ही
बीमार
का
उपचार
है
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मुहब्बत
है
मुझे
तुझ
सेे
मगर
मैं
कह
नहीं
सकता
मैं
तेरे
बिन
भी
ऐ
लड़की
क़सम
से
रह
नहीं
सकता
चली
आ
तू
नदी
बनकर
मुझे
अपना
बनाने
को
मैं
सागर
हूँ
मिरी
जाँ
इसलिए
मैं
बह
नहीं
सकता
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मैं
सब
से
उल्फ़त
भी
करता
हूँ
मैं
सब
से
नफ़रत
भी
करता
हूँ
अपनों
से
लड़ता
रहता
हूँ
पर
अपनों
की
ख़िदमत
भी
करता
हूँ
जब
कोई
अच्छा
लग
जाता
है
तो
उसकी
इज़्ज़त
भी
करता
हूँ
खाता
पीता
हूँ
जी
भर
के
मैं
पर
थोड़ी
कसरत
भी
करता
हूँ
मैं
सच
में
थोड़ा
सा
हूँ
ग़ाफ़िल
पर
दिल
से
मेहनत
भी
करता
हूँ
तन्हाई
अच्छी
लगती
है
पर
महफ़िल
में
शिरकत
भी
करता
हूँ
दुश्मन
कहता
हूँ
'सागर'
को
मैं
'सागर'
की
सोहबत
भी
करता
हूँ
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दिन
आज
का
कमाल
है
उसका
मिरा
विसाल
है
देखा
उसे
क़रीब
से
लड़की
परी
जमाल
है
मैं
हूँ
ज़रा
शरीफ़
सा
जीना
मिरा
मुहाल
है
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