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harshit karnatak
betaabi-e-dil ke vaaste koi maraasim to rakh
betaabi-e-dil ke vaaste koi maraasim to rakh | बेताबी-ए-दिल के वास्ते कोई मरासिम तो रख
- harshit karnatak
बेताबी-ए-दिल
के
वास्ते
कोई
मरासिम
तो
रख
जाते-जाते
कुछ
तो
कह
दे
कोई
मरासिम
तो
रख
- harshit karnatak
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कितनी
मुश्किल
के
बाद
टूटा
है
एक
रिश्ता
कभी
जो
था
ही
नहीं
Shahbaz Rizvi
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शायद
आ
जाए
कभी
देखने
वो
रश्क-ए-मसीह
मैं
किसी
और
से
इस
वास्ते
अच्छा
न
हुआ
Anwar Taban
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उसके
बदन
को
दी
नुमूद
हमने
सुखन
में
और
फिर
उसके
बदन
के
वास्ते
इक
क़बा़
भी
सी
गई
Jaun Elia
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सताना
रूठ
जाना
और
मनाना
इश्क़
है
लेकिन
अगर
हद
से
ज़ियादा
हो
तो
रिश्ते
टूट
जाते
हैं
Ajeetendra Aazi Tamaam
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ऐसी
हैं
क़ुर्बतें
के
मुझी
में
बसा
है
वो
ऐसे
हैं
फ़ासले
के
नहीं
राब्ता
नसीब
Afzal Ali Afzal
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किस
वास्ते
लिक्खा
है
हथेली
पे
मिरा
नाम
मैं
हर्फ़-ए-ग़लत
हूँ
तो
मिटा
क्यूँँ
नहीं
देते
Hasrat Jaipuri
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उस
ख़ूब-रू
से
रब्त
ज़रा
कम
हुआ
मेरा
ये
देख
कर
उदासी
मेरे
संग
लग
गई
Siddharth Saaz
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फिर
उसके
बाद
कोई
सिलसिला
नहीं
रक्खा
जिसे
मुआ'फ़
किया,
राब्ता
नहीं
रक्खा
Renu Nayyar
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उसको
भी
उसकी
बाँहों
में
सोना
होगा
सोना
ही
है
रिश्तों
की
भी
मजबूरी
है
Umesh Maurya
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घर
में
झीने
रिश्ते
मैंने
लाखों
बार
उधड़ते
देखे
चुपके
चुपके
कर
देती
है
जाने
कब
तुरपाई
अम्मा
Aalok Shrivastav
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तूने
यार
कभी
भी
खिलता
फूल
नहीं
देखा
तू
जब
उसको
देखेगा
तो
कैसे
देखेगा
harshit karnatak
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कैसे
कह
दूँ
सबको
उस
पल
कुछ
नइँ
हुआ
मुझे
जिस
पल
हँसते-हँसते
उसने
भाई
कहा
मुझे
बात
हँसी
की
है
लेकिन
मेरा
सच
तो
ये
है
हुआ
नहीं
कुछ
लेकिन
कुछ
भी
हो
सकता
था
मुझे
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इक
वीराने
के
बिस्मिल
थे
हम
पर
तब
भी
कितने
ख़ुश-दिल
थे
हम
फिर
एक
रोज़
आँसू
निकल
पड़े
फिर
एक
रोज़
तक
कामिल
थे
हम
डूब
गए
हम
तक
आने
वाले
ऐसे
दरिया
के
साहिल
थे
हम
ख़ुद
को
उर्यां
कर
के
देखा
जब
जाना
ख़ुद
अपने
हाइल
थे
हम
वो
तो
दुनिया
चाट
गई
हमको
वरना
ख़ुद
ही
इक
महफ़िल
थे
हम
जिन
को
चाहा
जिनसे
इश्क़
किया
उन
सब
की
पहली
मंज़िल
थे
हम
ये
आँखें
शीशा
तकती
हैं
और
रो
कर
कहती
हैं
क़ाबिल
थे
हम
नहीं
निभाया
साथ
किसी
ने
भी
हाँ
लेकिन
सबको
हासिल
थे
हम
समझौते
बढ़ते
ही
रहे
वरना
बच्चों
के
जैसे
ख़ुश-दिल
थे
हम
याद
किया
था
हम
ही
ने
उसको
'हर्षित'
ख़ुद
अपने
क़ातिल
थे
हम
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एक
तो
सब
हम
सेे
बरहम
हैं
ऊपर
से
फिर
ग़म
ही
ग़म
हैं
किस
पर
चीखें
चिल्लाएँ
हम
अब
तो
केवल
हम
ही
हम
हैं
ओ
क़हक़हा
लगाने
वालों
दर्द
ठहाकों
के
हर
दम
हैं
बाहर
इक
दो
जाम
बचे
हैं
अंदर
अब
भी
सौ
सौ
ग़म
हैं
नकली
फूलों
पर
भी
देखो
जमी
हुई
ढेरों
शबनम
हैं
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एक
तो
सब
हम
सेे
बरहम
हैं
ऊपर
से
फिर
ग़म
ही
ग़म
हैं
किस
पर
चीखें
चिल्लाएँ
हम
अब
तो
केवल
हम
ही
हम
हैं
ओ
क़हक़हा
लगाने
वालों
दर्द
ठहाकों
के
हर
दम
हैं
बाहर
इक
दो
जाम
बचे
हैं
अंदर
अब
भी
सौ
सौ
ग़म
हैं
नकली
फूलों
पर
भी
देखो
जमी
हुई
ढेरों
शबनम
हैं
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