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Harsh saxena
kuchh yuñ kiya hai is holi mujhko laal usne
kuchh yuñ kiya hai is holi mujhko laal usne | कुछ यूँँ किया है इस होली मुझको लाल उसने
- Harsh saxena
कुछ
यूँँ
किया
है
इस
होली
मुझको
लाल
उसने
होंठों
से
अपने
रंगे
हैं
मेरे
गाल
उसने
- Harsh saxena
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दर-ब-दर
ढूँढ़
रहे
हैं
जिसे
अरसे
से
हम
शख़्स
वो
मेरी
ही
आँखों
में
छिपा
बैठा
है
Harsh saxena
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उसी
की
आस
ने
सँभाल
रक्खा
हिज्र
में
मुझे
वही
जो
अपनी
ज़ुल्फ़ें
तक
नहीं
सँवार
पाती
है
Harsh saxena
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इस
ज़िंदगानी
की
ग़ज़ल
का
क़ाफ़िया
सा
लगता
है
उसके
बिना
तो
जैसे
पूरा
घर
बुझा
सा
लगता
है
यूँँ
तो
कोई
मंदिर
नहीं
दुनिया
में
उसके
नाम
का
लेकिन
न
जाने
क्यूँ
मुझे
वो
देवता
सा
लगता
है
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Harsh saxena
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गले
से
वो
लगा
ले
जिसको
भी
अपने
उसे
फिर
इत्र
की
दरकार
ही
क्या
है
Harsh saxena
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हम
को
मालूम
है
ये
सब
पगली
झुमकों
में
ढाती
हो
ग़ज़ब
पगली
धड़कने
तेज़
चलने
लगती
हैं
आती
हो
तुम
क़रीब
जब
पगली
किसकी
ख़ातिर
ग़ज़ल
सुनाते
हैं
हम
सेे
मत
पूछो
तुम
सबब
पगली
रात
यूँँ
ही
गुज़र
न
जाए
अब
हमको
बाँहों
में
लोगी
कब
पगली
हिज्र
में
ये
पता
लगा
हम
को
होती
कैसी
है
ये
तलब
पगली
इक
तिरी
याद
ने
सताया
यूँँ
हो
चुके
हैं
शराबी
लब
पगली
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Harsh saxena
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