zarre hi sahi koh se takra to ga.e ham | ज़र्रे ही सही कोह से टकरा तो गए हम

  - Habib Jalib
ज़र्रेहीसहीकोहसेटकरातोगएहम
दिललेकेसर-ए-अर्सा-ए-ग़मतोगएहम
अबनामरहेयारहेइश्क़मेंअपना
रूदाद-ए-वफ़ादारपेदोहरातोगएहम
कहतेथेजोअबकोईनहींजाँसेगुज़रता
लोजाँसेगुज़रकरउन्हेंझुटलातोगएहम
जाँअपनीगँवाकरकभीघरअपनाजलाकर
दिलउनकाहरइकतौरसेबहलातोगएहम
कुछऔरहीआलमथापस-ए-चेहरा-ए-याराँ
रहताजोयूँँहीराज़उसेपातोगएहम
अबसोचरहेहैंकियेमुमकिनहीनहींहै
फिरउनसेमिलनेकीक़समखातोगएहम
उट्ठेंकिउट्ठेंयेरज़ाउनकीहै'जालिब'
लोगोंकोसर-ए-दारनज़रतोगएहम
  - Habib Jalib
Share

profile-whatsappprofile-twitterprofile-fbprofile-copy