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Gulzar
ik khwaab ne aañkhen kholi hain kya mod aaya hai kahaanii men
ik khwaab ne aañkhen kholi hain kya mod aaya hai kahaanii men | इक ख़्वाब ने आँखें खोली हैं क्या मोड़ आया है कहानी में
- Gulzar
इक
ख़्वाब
ने
आँखें
खोली
हैं
क्या
मोड़
आया
है
कहानी
में
वो
भीग
रही
है
बारिश
में
और
आग
लगी
है
पानी
में
- Gulzar
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जब
भी
ये
दिल
उदास
होता
है
जाने
कौन
आस-पास
होता
है
आँखें
पहचानती
हैं
आँखों
को
दर्द
चेहरा-शनास
होता
है
गो
बरसती
नहीं
सदा
आँखें
अब्र
तो
बारह-मास
होता
है
छाल
पेड़ों
की
सख़्त
है
लेकिन
नीचे
नाख़ुन
के
मास
होता
है
ज़ख़्म
कहते
हैं
दिल
का
गहना
है
दर्द
दिल
का
लिबास
होता
है
डस
ही
लेता
है
सब
को
इश्क़
कभी
साँप
मौक़ा-शनास
होता
है
सिर्फ़
इतना
करम
किया
कीजे
आप
को
जितना
रास
होता
है
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फूलों
की
तरह
लब
खोल
कभी
ख़ुशबू
की
ज़बाँ
में
बोल
कभी
अल्फ़ाज़
परखता
रहता
है
आवाज़
हमारी
तोल
कभी
अनमोल
नहीं
लेकिन
फिर
भी
पूछ
तो
मुफ़्त
का
मोल
कभी
खिड़की
में
कटी
हैं
सब
रातें
कुछ
चौरस
थीं
कुछ
गोल
कभी
ये
दिल
भी
दोस्त
ज़मीं
की
तरह
हो
जाता
है
डाँवा-डोल
कभी
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आइना
देख
कर
तसल्ली
हुई
हम
को
इस
घर
में
जानता
है
कोई
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सहमा
सहमा
डरा
सा
रहता
है
जाने
क्यूँँ
जी
भरा
सा
रहता
है
काई
सी
जम
गई
है
आँखों
पर
सारा
मंज़र
हरा
सा
रहता
है
एक
पल
देख
लूँ
तो
उठता
हूँ
जल
गया
घर
ज़रा
सा
रहता
है
सर
में
जुम्बिश
ख़याल
की
भी
नहीं
ज़ानुओं
पर
धरा
सा
रहता
है
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कभी
तो
चौंक
के
देखे
कोई
हमारी
तरफ़
किसी
की
आँख
में
हम
को
भी
इंतिज़ार
दिखे
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