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Gaurav Kumar Aarambh
tumse yaari seekh raha hooñ
tumse yaari seekh raha hooñ | तुम सेे यारी सीख रहा हूँ
- Gaurav Kumar Aarambh
तुम
सेे
यारी
सीख
रहा
हूँ
दुनियादारी
सीख
रहा
हूँ
लंबा
जीवन
आन
पड़ा
है
ज़िम्मेदारी
सीख
रहा
हूँ
मेरे
दुख
में
किसकी
है
कितनी
भागेदारी
सीख
रहा
हूँ
नफ़रत
धोखा
इश्क़
मुहब्बत
बारी
बारी
सीख
रहा
हूँ
उनकी
मुझ
सेे
रब्त
की
वजहें
चालें
सारी
सीख
रहा
हूँ
- Gaurav Kumar Aarambh
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दिल
पर
इक
आज़ार
हुई
हैं
दो
आँखें
कहने
को
बस
चार
हुई
हैं
दो
आँखें
देखा
है
इक
बार
मगर
हर
शय
में
है
शायद
कुछ
बीमार
हुई
हैं
दो
आँखें
नज़रें
मिलना
और
भला
क्या
बच
पाना
सुनते
हैं
हथियार
हुई
हैं
दो
आँखें
सब
खोया
पर
चेहरे
की
रंगत
रोमानी
सजदे
की
हकदार
हुई
हैं
दो
आँखें
अबतक
मक़सद
एक
ये
खोजा
जीवन
का
जीने
का
आधार
हुई
हैं
दो
आँखें
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Gaurav Kumar Aarambh
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अपनों
का
साथ
छोड़
के
बढ़ता
रहा
मैं
यूँँ
ऊँचे
मक़ाम
तक
गया
नज़रों
से
गिर
गया
Gaurav Kumar Aarambh
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नया
किरदार
जीवन
में
बनाने
लग
गया
है
मुझे
भ्रम
है
ख़ुदा
साजिश
रचाने
लग
गया
है
किसी
ने
पास
आकर
दिल
पे
दस्तक
दी
है
मेरे
कोई
चेहरा
नज़र
अब
चाँद
आने
लग
गया
है
अलग
है
आजकल
कुछ
तो
फ़ज़ाएँ
ख़ुशनुमा
हैं
समय
भी
आजकल
नज़रें
चुराने
लग
गया
है
बताऊँ
राज़
कैसे
मेरे
सारे
दोस्तों
को
वो
कहते
हैं
अकेले
मुस्कुराने
लग
गया
है
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Gaurav Kumar Aarambh
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ये
मत
पूछो
शे'र
ग़ज़ल
में
किसका
ज़िक्र
है
कौन
लिखा
है
अंतर्मन
का
शोर
सराबा
मैंने
अपना
ये
मौन
लिखा
है
Gaurav Kumar Aarambh
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अब
जब
भी
तन्हाई
खाती
है
चंदा
देखा
करता
हूँ
मुझको
पूरा
करने
में
तब
झलकी
ही
काफ़ी
थी
तेरी
Gaurav Kumar Aarambh
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