nazar nazar men ada-e-jamaal rakhte the | नज़र नज़र में अदा-ए-जमाल रखते थे

  - Ghulam Mohammad Qasir
नज़रनज़रमेंअदा-ए-जमालरखतेथे
हमएकशख़्सकाकितनाख़यालरखतेथे
जबींपेआनेदेतेथेइकशिकनभीकभी
अगरचेदिलमेंहज़ारोंमलालरखतेथे
ख़ुशीउसीकीहमेशानज़रमेंरहतीथी
औरअपनीक़ुव्वत-ए-ग़मभीबहालरखतेथे
बसइश्तियाक़-ए-तकल्लुममेंबार-हाहमलोग
जवाबदिलमेंज़बाँपरसवालरखतेथे
उसीसेकरतेथेहमरोज़शबकाअंदाज़ा
ज़मींपेरहकेवोसूरजकीचालरखतेथे
जुनूँकाजाममोहब्बतकीमयख़िरदकाख़ुमार
हमींथेवोजोयेसारेकमालरखतेथे
छुपाकेअपनीसिसकतीसुलगतीसोचोंसे
मोहब्बतोंकेउरूजज़वालरखतेथे
कुछउनकाहुस्नभीथामावरामिसालोंसे
कुछअपनाइश्क़भीहमबे-मिसालरखतेथे
ख़तानहींजोखिलेफूलराह-ए-सरसरमें
येजुर्महैकिवोफ़िक्र-ए-मआलरखतेथे
  - Ghulam Mohammad Qasir
Share

profile-whatsappprofile-twitterprofile-fbprofile-copy