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Ghulam Abbas
ye hai vo gudiya
ye hai vo gudiya | ये है वो गुड़िया
- Ghulam Abbas
ये
है
वो
गुड़िया
आफ़त
की
पुड़िया
सलमा
ने
जिस
को
बेटी
बनाया
ये
है
वो
चूहा
भूरा
लंडूरा
भूका
चटोरा
गुड़िया
को
जिस
ने
चुटिया
से
खींचा
पंजों
में
भींचा
गुड़िया
वो
गुड़िया
आफ़त
की
पुड़िया
सलमा
ने
जिस
को
बेटी
बनाया
ये
है
वो
बिल्ली
मोटी
मुटल्ली
आँखों
पे
जिस
की
छाई
थी
झिल्ली
नौ
सौ
वो
चूहे
खा
कर
चली
थी
हज
कर
के
पल्टी
चूहे
को
देखा
ललचाई
जी
में
तौबा
को
तोड़ा
आँगन
में
रपटी
चूहे
पे
झपटी
चूहा
बना
वो
बस
इक
निवाला
थी
ना
वो
आख़िर
चूहों
की
ख़ाला
चूहा
वो
चूहा
भूरा
लंडूरा
भूका
चटोरा
गुड़िया
को
जिस
ने
चुटिया
से
खींचा
पंजों
में
भींचा
गुड़िया
वो
गुड़िया
आफ़त
की
पुड़िया
सलमा
ने
जिस
को
बेटी
बनाया
ये
है
वो
कुत्ता
काला
कलूटा
ख़ूँ-ख़ार
नज़रें
खुजली
का
मारा
बिल्ली
को
जिस
ने
आ
के
दबोचा
और
फिर
रगेदा
और
फिर
भंभोड़ा
बिल्ली
वो
बिल्ली
मोटी
मुटल्ली
आँखों
पे
जिस
की
छाई
थी
झिल्ली
नौ
सौ
वो
चूहे
खा
कर
चली
थी
हज
कर
के
पल्टी
चूहे
को
देखा
ललचाई
जी
में
तौबा
को
तोड़ा
आँगन
में
रपटी
चूहे
पे
झपटी
चूहा
बना
वो
बस
इक
निवाला
थी
न
वो
आख़िर
चूहों
की
ख़ाला
चूहा
वो
चूहा
भूरा
लंडूरा
भूका
चटोरा
गुड़िया
को
जिस
ने
चुटिया
से
खींचा
गुड़िया
वो
गुड़िया
आफ़त
की
पुड़िया
बेटी
बनाया
ये
है
वो
गाय
बिफरी
सी
हाए
अल्लाह
बचाए
हैं
सींग
जिस
के
तेज़
और
नुकीले
कुत्ते
को
जिस
ने
सींगों
में
अपने
ले
के
उछाला
धरती
पे
पटख़ा
सर
उस
का
चटख़ा
कुत्ता
वो
कुत्ता
काला
कलूटा
ख़ूँ-ख़ार
नज़रें
खुजली
का
मारा
बिल्ली
को
जिस
ने
आ
के
दबोचा
और
फिर
रगेदा
और
फिर
भंभोड़ा
बिल्ली
वो
बिल्ली
मोटी
और
मुटल्ली
आँखों
पे
जिस
की
छाई
थी
झिल्ली
नौ
सौ
वो
चूहे
खा
कर
चली
थी
हज
कर
के
पल्टी
चूहे
को
देखा
ललचाई
जी
में
तौबा
को
तोड़ा
आँगन
में
रपटी
चूहे
पे
झपटी
चूहा
बना
वो
बस
इक
निवाला
थी
ना
वो
आख़िर
चूहों
की
ख़ाला
चूहा
वो
चूहा
भूरा
लंडूरा
भूका
चटोरा
गुड़िया
को
जिस
ने
चुटिया
से
खींचा
पंजों
में
भींचा
गुड़िया
वो
गुड़िया
आफ़त
की
पुड़िया
सलमा
ने
जिस
को
बेटी
बनाया
- Ghulam Abbas
मेरे
आँगन
में
एक
बूढ़ा
पेड़
छाँव
भी
देता
है,
दुआएँ
भी
Ankit Maurya
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तुम्हारे
बाद
इस
आँगन
में
फूल
खिलने
पर
ख़ुशी
हुई
भी
तो
ये
दुख
हुआ
कि
दें
किसको
Mohit Dixit
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मेरी
ख़्वाहिश
है
कि
आँगन
में
न
दीवार
उठे
मेरे
भाई
मेरे
हिस्से
की
ज़मीं
तू
रख
ले
Rahat Indori
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हुआ
करती
थी
मेरी
ईद
जिसके
दीद
से
साहिल
उतर
आया
है
देखो
चाँद
वो
ग़ैरों
के
आँगन
में
A R Sahil "Aleeg"
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वो
भी
इक
दौर
था
कि
सावन
में
झूले
पड़ते
थे
घर
के
आँगन
में
Harsh saxena
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ओ
सखी
मन
उसका
तो
तन
भी
उसी
का
हक़
है
उसको
ग़ैर
ये
आँगन
न
चू
में
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Neeraj Neer
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