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Ghulam Abbas
ek tha ghoda ajab niraala
ek tha ghoda ajab niraala | एक था घोड़ा अजब निराला
- Ghulam Abbas
एक
था
घोड़ा
अजब
निराला
बातें
हवा
से
करने
वाला
रंग
उस
का
चितकबरा
ऐसा
सावन
मास
के
बादल
जैसा
क़द
था
उस
का
यूँँ
तो
छोटा
जिस्म
था
लेकिन
ख़ासा
मोटा
सर्कस
में
कर्तब
दिखलाता
छोटे
बड़ों
को
ख़ूब
हँसाता
उछला
कूदा
नाचा
करता
और
हवा
में
तरारे
भरता
इक
दिन
सर्कस
में
छुट्टी
थी
घोड़े
को
बस
सैर
की
सूझी
सर्कस
से
वो
बाहर
निकला
और
फिर
इक
मैदान
में
पहुँचा
वाँ
लड़के
डंड
पेल
रहे
थे
गेंद
से
भी
कुछ
खेल
रहे
थे
घोड़े
को
ये
खेल
जो
भाया
दिल
में
उस
के
जोश
सा
आया
उस
ने
कहा
ऐ
भाई
लड़को
खेल
में
मुझ
को
शामिल
कर
लो
लड़के
बोले
अच्छा
आओ
तुम
भी
खड़े
इक
जा
हो
जाओ
लड़के
थे
गो
सब
ही
खिलाड़ी
घोड़ा
भी
था
कोई
अनाड़ी
हाथ
से
गेंद
दबोचें
लड़के
घोड़ा
मुँह
से
गेंद
दबोचे
खेल
ने
ऐसा
रंग
जमाया
सब
ने
ख़ूब
ही
लुत्फ़
उठाया
अब
तुम
बात
सुनो
आगे
की
गेंद
आई
इक
बार
उछलती
घोड़े
की
आई
कम-बख़्ती
उस
ने
झाड़ी
इक
दोलत्ती
गेंद
पकड़ने
फिर
वो
लपका
ऐसा
लगा
कुछ
उस
को
धक्का
गेंद
वो
उस
के
हल्क़
से
उतरी
और
बस
सीधी
पेट
में
पहुँची
जान
पे
उस
की
ऐसी
गई
बन
भूल
गया
वो
सब
अपने
फ़न
उछला
कूदा
शोर
मचाया
घोड़े
को
आराम
न
आया
लड़के
उस
को
जैसे-तैसे
ले
के
शिफ़ा
ख़ाने
में
पहुँचे
दौड़ा
दौड़ा
आया
सर्जन
करना
था
जिस
को
ऑपरेशन
घोड़े
का
था
हाल
जो
अबतर
झट
से
निकाला
उस
ने
नश्तर
घोड़े
के
जब
पेट
को
चीरा
अंदर
से
इक
मालटा
निकला
- Ghulam Abbas
हमने
ही
लौटने
का
इरादा
नहीं
किया
उसने
भी
भूल
जाने
का
वा'दा
नहीं
किया
Parveen Shakir
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और
क्या
चाहती
है
गर्दिश-ए-अय्याम
कि
हम
अपना
घर
भूल
गए
उन
की
गली
भूल
गए
Jaun Elia
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कुछ
बता
तू
ही
नशेमन
का
पता
मैं
तो
ऐ
बाद-ए-सबा
भूल
गया
Majrooh Sultanpuri
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जो
अंजान
थे
वो
मेरे
यार
निकले
मगर
जो
भी
अपने
थे
बेकार
निकले
ज़मीं
खा
गई
उन
वफ़ाओं
को
आख़िर
सितम
ये
हुआ
हम
गुनहगार
निकले
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Hameed Sarwar Bahraichi
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वो
तिरे
नसीब
की
बारिशें
किसी
और
छत
पे
बरस
गईं
दिल-ए-बे-ख़बर
मिरी
बात
सुन
उसे
भूल
जा
उसे
भूल
जा
Amjad Islam Amjad
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ऐ
शौक़-ए-नज़ारा
क्या
कहिए
नज़रों
में
कोई
सूरत
ही
नहीं
ऐ
ज़ौक़-ए-तसव्वुर
क्या
कीजे
हम
सूरत-ए-जानाँ
भूल
गए
Asrar Ul Haq Majaz
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जमाना
भूल
पायेगा
नहीं
अपनी
मुहब्बत
छपेंगे
क्लास
दसवीं
में
सभी
किस्से
हमारे
Shubham Seth
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दफ़्तर
तक
जाकर
के
वापस
लौटा
हूँ
गले
लगाना
भूल
गया
था
तुमको
मैं
Tanoj Dadhich
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याद
भूले
हुए
लोगों
को
किया
जाता
है
भूल
जाओ
कि
तुम्हें
याद
किया
जाएगा
Charagh Sharma
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कम
अज़
कम
इक
ज़माना
चाहता
हूँ
कि
तुम
को
भूल
जाना
चाहता
हूँ
ख़ुदारा
मुझ
को
तन्हा
छोड़
दीजे
मैं
खुल
कर
मुस्कुराना
चाहता
हूँ
सरासर
आप
हूँ
मद्दे
मुक़ाबिल
ख़ुदी
ख़ुद
को
हराना
चाहता
हूँ
मेरे
हक़
में
उरूस-ए-शब
है
मक़्तल
सो
उस
से
लब
मिलाना
चाहता
हूँ
ये
आलम
है,
कि
अपने
ही
लहू
में
सरासर
डूब
जाना
चाहता
हूँ
सुना
है
तोड़ते
हो
दिल
सभों
का
सो
तुम
से
दिल
लगाना
चाहता
हूँ
उसी
बज़्म-ए-तरब
की
आरज़ू
है
वही
मंज़र
पुराना
चाहता
हूँ
नज़र
से
तीर
फैंको
हो,
सो
मैं
भी
जिगर
पर
तीर
खाना
चाहता
हूँ
चराग़ों
को
पयाम-ए-ख़ामुशी
दे
तेरे
नज़दीक
आना
चाहता
हूँ
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Kazim Rizvi
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