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Faiyaz Rifat
jinhen chahte ho pasand karte ho
jinhen chahte ho pasand karte ho | जिन्हें चाहते हो पसंद करते हो
- Faiyaz Rifat
जिन्हें
चाहते
हो
पसंद
करते
हो
उन
की
रूहों
को
टटोलो
सच्चाइयों
की
गिरहों
को
खोलो
वहाँ
भी
अंधेरे
खंडर
हैं
वहाँ
भी
वीरान
मंज़र
हैं
वहाँ
भी
ज़ख़्मों
के
बसेरे
हैं
वहाँ
भी
तन्हाइयों
के
डेरे
हैं
वो
बस
हँसते
हैं
नुमाइश
के
लिए
उन
की
ज़हर-ख़ंद
हँसी
को
समझो
गोशा-ए-आफ़ियत
उन्हें
मिला
है
न
तुम्हें
मिलेगा
कि
वो
भी
आसी
ख़्वाहिशों
के
कि
तुम
भी
आसी
आरज़ुओं
के
जिन्हें
चाहते
हो
पसंद
करते
हो
उन
की
रूहों
को
टटोलो
सच्चाइयों
की
गिरहों
को
खोलो
- Faiyaz Rifat
पस-मंज़र
में
'फ़ीड'
हुए
जाते
हैं
इंसानी
किरदार
फ़ोकस
में
रफ़्ता
रफ़्ता
शैतान
उभरता
आता
है
Abdul Ahad Saaz
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रोज़
बस्ते
हैं
कई
शहर
नए
रोज़
धरती
में
समा
जाते
हैं
Kaifi Azmi
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कम
अज़
कम
इक
ज़माना
चाहता
हूँ
कि
तुम
को
भूल
जाना
चाहता
हूँ
ख़ुदारा
मुझ
को
तन्हा
छोड़
दीजे
मैं
खुल
कर
मुस्कुराना
चाहता
हूँ
सरासर
आप
हूँ
मद्दे
मुक़ाबिल
ख़ुदी
ख़ुद
को
हराना
चाहता
हूँ
मेरे
हक़
में
उरूस-ए-शब
है
मक़्तल
सो
उस
से
लब
मिलाना
चाहता
हूँ
ये
आलम
है,
कि
अपने
ही
लहू
में
सरासर
डूब
जाना
चाहता
हूँ
सुना
है
तोड़ते
हो
दिल
सभों
का
सो
तुम
से
दिल
लगाना
चाहता
हूँ
उसी
बज़्म-ए-तरब
की
आरज़ू
है
वही
मंज़र
पुराना
चाहता
हूँ
नज़र
से
तीर
फैंको
हो,
सो
मैं
भी
जिगर
पर
तीर
खाना
चाहता
हूँ
चराग़ों
को
पयाम-ए-ख़ामुशी
दे
तेरे
नज़दीक
आना
चाहता
हूँ
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Kazim Rizvi
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जब
बात
वफ़ा
की
आती
है
जब
मंज़र
रंग
बदलता
है
और
बात
बिगड़ने
लगती
है
वो
फिर
इक
वा'दा
करते
हैं
Afeef siraj
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सब
यार
सोचते
थे
रहेगा
वही
समाँ
इक
मैं
ही
बस
बचा
हूँ
कोई
सौ
पचास
में
Amaan Pathan
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काश
ऐसा
कोई
मंज़र
होता
मेरे
काँधे
पे
तेरा
सर
होता
Tahir Faraz
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ग़ज़ल
बनकर
मेरे
दिल
में
समा
जा
मैं
तुझको
गुनगुनाना
चाहता
हूँ
D Faiz Khan
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इश्क़
का
ज़ौक़-ए-नज़ारा
मुफ़्त
में
बदनाम
है
हुस्न
ख़ुद
बे-ताब
है
जल्वा
दिखाने
के
लिए
Asrar Ul Haq Majaz
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जिस
शाने
पर
सर
रखते
हो
उस
शाने
पर
सो
जाते
हो
जाने
कैसे
दीदावर
हो
हर
मंज़र
में
खो
जाते
हो
Poonam Yadav
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दो
मुल्कों
के
सियासी
खेल
में
जाने
यहाँ
पर
कितनों
के
घर
उजड़े
हैं
मौला
वही
हर
सुब्ह
मंज़र
देखना
पड़ता
हज़ारों
लोग
यूँँ
ही
मरते
हैं
मौला
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Harsh saxena
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