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Faisal Hashmi
roz is aas pe darwaaza khula rakhta hooñ
roz is aas pe darwaaza khula rakhta hooñ | रोज़ इस आस पे दरवाज़ा खुला रखता हूँ
- Faisal Hashmi
रोज़
इस
आस
पे
दरवाज़ा
खुला
रखता
हूँ
शायद
आ
जाए
वो
चुपके
से
कभी
उस
जानिब
वो
जो
दुनिया
से
बहुत
दूरी
पर
आग
के
ख़ौफ़
से
सह
में
हुए
इक
लम्हे
में
छुप
के
बच्चे
की
तरह
बैठा
है
मुंतज़िर
हूँ
कि
कोई
उस
को
सहारा
दे
दे
जिसे
वो
थाम
के
ज़ुल्मत
का
सफ़र
तय
कर
ले
और
मिल
जाए
वो
मुझ
से
कि
मिरे
चेहरे
पर
मेरी
आँखों
ने
सजा
रक्खा
है
उम्मीद
का
बाब
- Faisal Hashmi
दिल
की
ख़ातिर
एक
रिश्ते
को
बचाने
के
लिए
आग
मैंने
ही
लगा
ली
ख़ुद
मिरे
घरबार
में
Shashank Shekhar Pathak
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अपने
बदन
की
तुम
भी
हिफ़ाज़त
न
कर
सके
हम
ने
भी
ख़ूब
ग़ैर
के
चूल्हे
से
आग
ली
Harsh saxena
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मैं
क्या
करूँँ
मेरी
बेगम
सुहाग
ढूँढे
है
मेरे
बुझे
हुए
चूल्हे
में
आग
ढूँढ़े
है
वो
दिन
गए
कि
उड़ाते
थे
फ़ाख़्ताएँ
हम
सपेरा
चूहे
के
इक
बिल
में
नाग
ढूँढे
है
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Paplu Lucknawi
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ये
इश्क़
नहीं
आसाँ
इतना
ही
समझ
लीजे
इक
आग
का
दरिया
है
और
डूब
के
जाना
है
Jigar Moradabadi
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जब
सर-ए-शाम
पजीराई-ए-फ़न
होती
है
शाहज़ादी
को
कनीज़ों
से
जलन
होती
है
ले
तो
आया
हूँ
तुझे
घेर
के
अपनी
जानिब
आगे
इंसान
की
अपनी
भी
लगन
होती
है
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Azhar Faragh
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वो
बुझ
गया
तो
चला
उसकी
अहमियत
का
पता
कि
उस
की
आग
से
कितने
चराग़
जलते
थे
Shakeel Azmi
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तेरी
आँखों
में
जो
इक
क़तरा
छुपा
है,
मैं
हूँ
जिसने
छुप
छुप
के
तेरा
दर्द
सहा
है,
मैं
हूँ
एक
पत्थर
कि
जिसे
आँच
न
आई,
तू
है
एक
आईना
कि
जो
टूट
चुका
है,
मैं
हूँ
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Fauziya Rabab
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मैं
ने
हाथों
से
बुझाई
है
दहकती
हुई
आग
अपने
बच्चे
के
खिलौने
को
बचाने
के
लिए
Shakeel Jamali
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आप
दस्ताने
पहनकर
छू
रहे
हैं
आग
को
आप
के
भी
ख़ून
का
रंग
हो
गया
है
साँवला
Dushyant Kumar
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बाद-ए-बहार
में
सब
आतिश
जुनून
की
है
हर
साल
आवती
है
गर्मी
में
फ़स्ल-ए-होली
Wali Uzlat
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जब
ख़ाक
उड़ाता
हुआ
नींदों
का
सफ़र
हो
फिर
क्यूँ
न
किसी
और
ही
दुनिया
से
गुज़र
हो
वो
मेरे
बराबर
से
निकल
आया
था
वर्ना
दीवार
न
थी
ऐसी
कि
जिस
में
कोई
दर
हो
मैं
जिस्म
से
गुज़रा
हूँ
यही
सोच
के
अक्सर
शायद
कि
तिरी
रूह
का
इस
राह
में
घर
हो
ये
कैसी
तमन्ना
है
कि
इस
दश्त
में
'फ़ैसल'
दरिया
हो
किनारा
हो
सफ़ीना
हो
भँवर
हो
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Faisal Hashmi
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