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Fahmi Badayuni
uski zulfen udaas ho jaa.e
uski zulfen udaas ho jaa.e | उसकी जुल्फ़ें उदास हो जाए
- Fahmi Badayuni
उसकी
जुल्फ़ें
उदास
हो
जाए
इस-क़दर
रोशनी
भी
ठीक
नहीं
तुमने
नाराज़
होना
छोड़
दिया
इतनी
नाराज़गी
भी
ठीक
नहीं
- Fahmi Badayuni
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बहुत
से
ग़म
समेट
कर
बनाई
एक
डायरी
चुवाव
देख
रात
भर
बनाई
एक
डायरी
ये
हर्फ़
हर्फ़
लफ़्ज़
लफ़्ज़
क़ब्र
है
वरक़
वरक़
दिल-ए-हज़ीं
से
इस
क़दर
बनाई
एक
डायरी
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Aves Sayyad
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मज़ाक
सहना
नहीं
है
हँसी
नहीं
करनी
उदास
रहने
में
कोई
कमी
नहीं
करनी
Swapnil Tiwari
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वक़्त
की
गर्दिशों
का
ग़म
न
करो
हौसले
मुश्किलों
में
पलते
हैं
Mahfuzur Rahman Adil
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तेरे
जाने
से
ज़्यादा
हैं
न
कम
पहले
थे
हम
को
लाहक़
हैं
वही
अब
भी
जो
ग़म
पहले
थे
Afzal Khan
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कैसा
दिल
और
इस
के
क्या
ग़म
जी
यूँँ
ही
बातें
बनाते
हैं
हम
जी
Jaun Elia
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जीना
मुश्किल
है
के
आसान,
ज़रा
देख
तो
लो
लोग
लगते
हैं
परेशान,
ज़रा
देख
तो
लो
इन
चराग़ों
के
तले
ऐसे
अँधेरे
क्यूँँ
हैं?
तुम
भी
रह
जाओगे
हैरान,
ज़रा
देख
तो
लो
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Javed Akhtar
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ख़ुदा
की
शा'इरी
होती
है
औरत
जिसे
पैरों
तले
रौंदा
गया
है
तुम्हें
दिल
के
चले
जाने
पे
क्या
ग़म
तुम्हारा
कौन
सा
अपना
गया
है
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Ali Zaryoun
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अब
क्या
ही
ग़म
मनाएँ
कि
क्या
क्या
हुआ
मियाँ
बर्बाद
होना
ही
था
सो
बर्बाद
हो
गए
shaan manral
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मेरे
साथ
हँसने
वालों
शरीक
हों
दुख
में
गर
गुलाब
की
ख़्वाहिश
है
तो
चूम
काँटों
को
Neeraj Neer
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इस
कदर
मत
उदास
हो
जैसे
ये
मोहब्बत
का
आख़िरी
दिन
है
Idris Babar
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मेरी
पहली
नज़र
लौटा
दे
मुझ
को
तेरी
जानिब
दुबारा
देखना
है
Fahmi Badayuni
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तो
क्या
उसको
मैं
होंठों
से
बजाऊँ
तिरे
दर
पे
जो
घंटी
लग
गई
है
चराग़
उसने
मिरे
लौटा
दिए
हैं
अब
उसके
घर
में
बिजली
लग
गई
है
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Fahmi Badayuni
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ये
जो
बाहर
ख़ुदास
डर
रहे
हैं
बहुत
कुछ
दिल
के
अंदर
कर
रहे
हैं
अभी
देखा
है
कुछ
टीवी
में
शायद
मिरे
बच्चे
मुझी
से
डर
रहे
हैं
इरादा
है
मिरा
घर
बेचने
का
पड़ोसी
ख़ूब
ख़ातिर
कर
रहे
हैं
यहाँ
पर
कोई
दरिया-दिल
नहीं
है
सब
अपने
घर
का
पानी
भर
रहे
हैं
तिरी
ख़ुश्बू
से
जो
वाक़िफ़
नहीं
हैं
वो
फूलों
से
गुज़ारा
कर
रहे
हैं
निकल
आए
तो
फिर
रोने
न
देंगे
हम
अपने
आँसुओं
से
डर
रहे
हैं
टहलते
फिर
रहे
हैं
सारे
घर
में
तिरी
ख़ाली
जगह
को
भर
रहे
हैं
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Fahmi Badayuni
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तेरे
जैसा
कोई
मिला
ही
नहीं
कैसे
मिलता
कहीं
पे
था
ही
नहीं
घर
के
मलबे
से
घर
बना
ही
नहीं
ज़लज़ले
का
असर
गया
ही
नहीं
मुझ
पे
हो
कर
गुज़र
गई
दुनिया
मैं
तिरी
राह
से
हटा
ही
नहीं
कल
से
मसरूफ़-ए-ख़ैरियत
मैं
हूँ
शे'र
ताज़ा
कोई
हुआ
ही
नहीं
रात
भी
हम
ने
ही
सदारत
की
बज़्म
में
और
कोई
था
ही
नहीं
यार
तुम
को
कहाँ
कहाँ
ढूँडा
जाओ
तुम
से
मैं
बोलता
ही
नहीं
याद
है
जो
उसी
को
याद
करो
हिज्र
की
दूसरी
दवा
ही
नहीं
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Fahmi Badayuni
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ज़रा
मोहतात
होना
चाहिए
था
बग़ैर
अश्कों
के
रोना
चाहिए
था
अब
उन
को
याद
कर
के
रो
रहे
हैं
बिछड़ते
वक़्त
रोना
चाहिए
था
मिरी
वादा-ख़िलाफ़ी
पर
वो
चुप
है
उसे
नाराज़
होना
चाहिए
था
चला
आता
यक़ीनन
ख़्वाब
में
वो
हमें
कल
रात
सोना
चाहिए
था
सुई
धागा
मोहब्बत
ने
दिया
था
तो
कुछ
सीना
पिरोना
चाहिए
था
हमारा
हाल
तुम
भी
पूछते
हो
तुम्हें
मालूम
होना
चाहिए
था
वफ़ा
मजबूर
तुम
को
कर
रही
थी
तो
फिर
मजबूर
होना
चाहिए
था
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Fahmi Badayuni
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