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Fahmi Badayuni
aaj paivand ki zaroorat hai
aaj paivand ki zaroorat hai | आज पैवंद की ज़रूरत है
- Fahmi Badayuni
आज
पैवंद
की
ज़रूरत
है
ये
सज़ा
है
रफ़ू
न
करने
की
- Fahmi Badayuni
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आरज़ू'
जाम
लो
झिजक
कैसी
पी
लो
और
दहशत-ए-गुनाह
गई
Arzoo Lakhnavi
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एक
मुद्दत
से
परिंदे
की
तरह
ये
क़ैद
है
रूह
मेरे
जिस्म
से
'क़ासिद'
रिहा
होती
नहीं
Gurbir Chhaebrra
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इसी
लिए
हमें
एहसास-ए-जुर्म
है
शायद
अभी
हमारी
मोहब्बत
नई
नई
है
ना
Afzal Khan
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बिछड़ते
वक़्त
भी
हिम्मत
नहीं
जुटा
पाया
कभी
भी
उस
को
गले
से
नहीं
लगा
पाया
किसी
को
चाहते
रहने
की
सज़ा
पाई
है
मैं
चार
साल
में
लड़की
नहीं
पटा
पाया
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Shadab Asghar
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मिलेगी
क़ैद
से
कैसे
रिहाई
कौन
सोचेगा
यहाँ
तेरे
सिवा
तेरी
भलाई
कौन
सोचेगा
ज़माने
भर
का
तू
सोचेगा
तो
फिर
तेरे
बारे
में
मुझे
तू
ही
बता
दे
मेरे
भाई,
कौन
सोचेगा?
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Siddharth Saaz
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तेरी
ख़ुशबू
को
क़ैद
में
रखना
इत्रदानों
के
बस
की
बात
नहीं
Fahmi Badayuni
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करे
जो
क़ैद
जुनूँ
को
वो
जाल
मत
देना
हो
जिस
में
होश
उसे
ऐसा
हाल
मत
देना
जो
मुझ
सेे
मिलने
का
तुमको
कभी
ख़याल
आए
तो
इस
ख़याल
को
तुम
कल
पे
टाल
मत
देना
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Kashif Adeeb Makanpuri
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मिरी
सुब्ह
का
यूँँ
भी
इज़हार
हो
पियाला
हो
कॉफ़ी
का
अख़बार
हो
कोई
जुर्म
साबित
न
हो
उसका
फिर
जो
तेरी
हँसी
में
गिरफ़्तार
हो
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Swapnil Tiwari
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इश्क़
करना
इक
सज़ा
है
क्या
करें
इश्क़
का
अपना
मज़ा
है
क्या
करें
Syed Naved Imam
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हम
ने
क़ुबूल
कर
लिया
अपना
हर
एक
जुर्म
अब
आप
भी
तो
अपनी
अना
छोड़
दीजिए
Harsh saxena
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चलती
साँसों
को
जाम
करने
लगा
वो
नज़र
से
कलाम
करने
लगा
रात
फ़रहाद
ख़्वाब
में
आया
और
फ़र्शी
सलाम
करने
लगा
फिर
मैं
ज़हरीले
कार-ख़ानों
में
ज़िंदा
रहने
का
काम
करने
लगा
साफ़
इंकार
कर
नहीं
पाया
वो
मिरा
एहतिराम
करने
लगा
लैला
घर
में
सिलाई
करने
लगी
क़ैस
दिल्ली
में
काम
करने
लगा
हिज्र
के
माल
से
दिल-ए-नादाँ
वस्ल
का
इंतिज़ाम
करने
लगा
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Fahmi Badayuni
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एक
मेहमाँ
का
हिज्र
तारी
है
मेज़बानी
की
मश्क़
जारी
है
सिर्फ़
हल्की
सी
बे-क़रारी
है
आज
की
रात
दिल
पे
भारी
है
कोई
पंछी
कोई
शिकारी
है
ज़िंदा
रहने
की
जंग
जारी
है
बस
तिरे
ग़म
की
ग़म-गुसारी
है
और
क्या
शाएरी
हमारी
है
आप
करते
हैं
शबनमी
बातें
और
मिरी
प्यास
रेग-ज़ारी
है
अब
कहाँ
दश्त
में
जुनूँ
वाले
जिस
को
देखो
वही
शिकारी
है
मेरे
आँसू
नहीं
हैं
ला-वारिस
इक
तबस्सुम
से
रिश्ते-दारी
है
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Fahmi Badayuni
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हाल
मीठे
फलों
का
मत
पूछो
रात
दिन
चाकूओं
में
रहते
हैं
Fahmi Badayuni
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आप
तशरीफ़
लाए
थे
इक
रोज़
दूसरे
रोज़
ए'तिबार
हुआ
Fahmi Badayuni
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तेरी
ख़ुशबू
को
क़ैद
में
रखना
इत्रदानों
के
बस
की
बात
नहीं
Fahmi Badayuni
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