zikr-e-maazi se shab-o-roz sataate hain mujhe | ज़िक्र-ए-माज़ी से शब-ओ-रोज़ सताते हैं मुझे

  - Dr. Naresh
ज़िक्र-ए-माज़ीसेशब-ओ-रोज़सतातेहैंमुझे
मेरेअहबाबहीदीवानाबनातेहैंमुझे
मैंतोइकजुमला-ए-बा-मा'नी-ओ-बा-मतलबहूँ
औरवोहर्फ़-ए-ग़लतकहकेमिटातेहैंमुझे
एकबे-रब्तत'अल्लुक़कासहारालेकर
लोगक्याइश्क़केअंदाज़सिखातेहैंमुझे
जोथेअपनेहीख़द-ओ-ख़ालसेग़ाफ़िलकलतक
आजवोलोगभीआईनादिखातेहैंमुझे
कुछतबीअ'तहीबग़ावतकीतरफ़माइलहै
वर्नामयख़ानेकेआदाबतोआतेहैंमुझे
कुछत'अल्लुक़कोईनिस्बतनहींलेकिनफिरभी
'नरेश'आजसुनाहैकिबनातेहैंमुझे
  - Dr. Naresh
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